चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

Sunday, May 30, 2010

कबाड़ी वाला

कोलतार-सी

धधकती देह पर

ठुकी-झाँकती दो पनियल आँखें

सूखते होंठ-कर्रे बाल

लिये अधखुले धूल से सने पपोटे

ताकता है वह कभी आकाश तो

कभी घास के विराट मैदान-सा रीता ठेला

और लगाता है ज़ोर-की आवाज़

पेप्परला-कोप्पीला-ताबला-पेचपुर्ज़ा-खाली बोत्तल-कबाड़ला..

और हाँफ कर बैठ जाता है

ड्योड़ी पर, घूरकर

अपनी छोटी होती परछाई को,

इंतज़ार करता है वह

आसाढ़ की पहली फुहार का....

Friday, May 28, 2010

अपनी परछाई

उस रोज़

भीड़ जमा थी

रईस-बुर्जुआ-टुच्चे-शातिर

सभी तो मना कर रहे थे

जेस्चर भी उनका यही दर्शा रहा था;

उसके जुड़वाँ हुए हैं……..,

वह वृक्ष-तल-वासिनी

मुक्तिबोध की वही पगली नायिका

वहीं अधजले-फिके-कण्डे और राख,

नहीं थी अब वह एकाकी,

चिपकी जिससे

दो नन्ही-नन्ही झाईं

सहसा भीड़ चिल्लाई,

लड़कियाँ हैं........

और भीड़ छँटने लगी, ठठाते हुए

कि तभी बज उठी थाली,

लड़का भी है....,

गोरा-चिट्टा

गोलमटोल.......

फिर घिर आई हतप्रभ भीड़ में

जाने कितनी चमक उठी

दर्पित-दपदप-आँखें.....,

तलाशने लगी अपनी परछाई.........।

Wednesday, May 19, 2010

अहा !

अहा ! कितनी प्यारी–सी लड़की
जो मिली थी मुझे घूरे पर
मृत-अजन्मी
पर फिर भी मैंने
उसे उठाया और
तब आँख खोल वह मुस्काई
जिसमें थीं अनंत सम्भावनाएँ….
मैंने चूम ली उसकी
अर्ध विकसित नाक
और ली ढेर सारी मुफ़त की मिठ्ठियाँ
उसने पकड़ लिया मेरा चश्मा और
खिलखिला उठी,
लोग अब कोनों से देखकर मुझे
अहमक कहते हैं
पर कई आँखें हैं जो
पूछती हैं कि
हँसती हुई कैसी लगती थी
उनकी
बिटिया............

Wednesday, May 5, 2010

चूहा मेरी बहन और रेटकिल

हद्द हो गई !

अब जा के मिला है जेब में,

वो बित्ते-भर का चूहा

जिसे कत्ल कर दिया था बवजह

कई बरस पहले,

मॉरटिन रेटकिल रख के

नहीं, ये विज्ञापन कतई नहीं है

बल्कि ज़रिया था मुक्ति का..........

पर फिर भी

चूहा तो मिला है !

और मारे बू के

छूट रही हैं उबकाईयां

जबकि उसी जेब में

-हाथ डालें-डालें गुज़ारा था मैंने जाड़ा

-खाना भी खाया था उन्हीं हाथों से

-हाथ भी तो मिलाया था कितनो से

तब भी,

न तो मुझे प्लेग हुआ

न ही किसी ने कुछ कहा..........

पर तअज्जुब है कि,

कैसे पता चल गया पुलिस को,

क्या इसलिये कि

दिन में एक दफे जागती है आत्मा,

और तभी से मैं

फ़रार हूँ................,

और भी हैं कई लोग

जो मेरी फ़िराक़ में हैं

जिन्हे चाहिये है वही चूहा,

ये वही थे

जो माँगा करते थे मेरा पेंट अक्सर

इसीलिये मैं नहाता भी था

पेंट पहनकर,

(था न यह अप्रतिम आईडिया..)

पर,

अंततः मैं पकड़ा जाता हूँ.....

ज़ब्ती-शिनाख्ती के

फौरन बाद

दर्ज होता है मुकद्दमा

उस बित्ते से चूहे की हत्या का,

और हुज़ूर बजाते हैं इधर हथौड़ा

तोड़ देते हैं वे

अप्रासंगिक निब को तत्काल

और मरने के स्फीत डर से बिलबिला जाता हूँ मैं

कि तभी ऐन वक्त पर

पेश होती है

चूहे की पीएम रपट

कि भूख से मरा था चूहा,

इसलिये मैं बरी किया जाता हूँ

बाइज़्ज़त बरी

हुर्रे........................।

फू..................

आप सोचते होंगे कि क्या हुआ

फिर रेटकिल का???

आप बहुत ज़्यादा सोचते हैं,

हाँ, मैं नशे में हूँ

श्श........श्श..........श्श.....श्श...

(बहुत धीरे से, एकदम फुसफुसा के..)

बहन को खिला दिये थे

वे टुकड़े चालाकी से

क्यूँकि शादी करी थी उसने

-किसी मुसल्मान से

-खुद के गोत्र में

-किसी कमतर जात में

हा...हा...हा...हा...हा...हा....

’फिलहाल आत्मा सो रही है....

और मॉरटिन रेटकिल भी खुश है

क्योकि इस बार चूहा नहीं

बल्कि बहन मरी थी ठीक बाहर जा के.....।

Saturday, May 1, 2010

पर

बारिश से भीगी
उस शाम को
देखा था
बुर्क़े के भीतर
कॉरसेट पहने उस
बुर्क़ानशीं को
और
जाने किस आलम में
आगे बढ़कर
छोटी-सी
बिन्दी लगा दी थी
उस शफ़्फ़ाफ़ चेहरे पर
वो स्तब्ध
देखती ही रही
और चली गई
फिर मिलने का वादा करके
(अगले दिन)
-वो ही शाम  थी
-वो ही बारिश
-वो ही बुर्क़ानशीं
पर.......???