Saturday, May 1, 2010
पर
Monday, April 19, 2010
Tuesday, April 13, 2010
लाश
जबकि
दोपहर बेहद दिलचस्प है..........।
और हम
हस्बे मामूल*
डर रहे हैं
लाश से
खासतौर पर जब हमने खुद
अपने हाथों से मारा हो..........”
हमें लगता है
कि वह मुरदा
कहीं आँखें न खोल ले
लिहाज़ा कई घण्टों तक हाथ में
चाकू लिये या कुछ भी
उसका इंतज़ार करते हैं,
कि कब वह आँखें खोले
और हम उसे
दोबारा गोद दें................”
ये लाश
किसी की भी हो सकती है
पर होती है
अक्सर
-किसी किसान की
-किसी जवान की
-किसी भूतपूर्व नक्सल की
-बाँध में डूबे किसी गाँव की
और मेरे इलावा
कोई भी हो सकता है
हत्यारा.........................”
जैसे कि आप
अरे! डरिए मत........”
हा.....हा......हा......हा........”
जबकि दोपहर बेहद दिलचस्प है ।
तब भी
वक्त खिसक लेता है दम साधे
और हम(यानी कि मैं क्यूँकि हम से डर भाग जाता है)
बैठे ही रहते हैं उसके पास
उन बंद आँखों में आँखें डालकर
अगरचे
मेरा उल्टा पाँव सो चुका है
और मारे दहशत के
मैं काँप रहा हूँ
कि लाश की जद में सिर्फ़ मैं ही हूँ
पर फिर भी
मैं बात कर सकता हूँ,
-बिना आँखें हटाए लाश से
अपनी दोस्त से
बेसाख़्ता....................................”
-बिना आँखें हटाए लाश से
कर लेता हूँ कामुक-चिंतन.........”
-बिना आँखें हटाए लाश से
हाथ मिला लेता हूँ
कत्ल करने को
जाते मोस्साद के एजेंट से.......”
और
-बिना आँखें हटाए लाश से
गुज़र जाता हूँ
मिर्ज़ा-मलिक के
पीछे भागते
जोकरों के समूह से.............”
आह........पर,
अब मैं थक चुका हूँ
डर रहा हूँ
खुद के एकालाप से
देखिये मेरा
दूसरा पाँव भी
सो चुका है
और मैं लाचार जानवर-सा पड़ा हूँ
किसी सूनसान बियाबान में;
रह-रह के झुरझुरी-सी
देह में फैल रही है
अब...मुझे इंतज़ार है,
पुलिस का
और देखिए तो
सायरन बजाते हुए गुज़र जाती हैं
पुलिस की ढेर-गाड़ियाँ......................,”
इस सन्नाटे में
उस........उस
लाश में हरकत हुई है, हाँ....हुई है.....
मेरा चाकू छिटक चुका है
कब का ....
और गूँजती है तीखी चीख...................”
वाक़ई में वाक़या
दिलचस्प था .................।”
*हस्बे मामूल-हमेशा की तरह
प्रणव सक्सेना “amitraghat.blogspot.com”
Friday, March 26, 2010
कुंता
Wednesday, March 24, 2010
Sunday, March 21, 2010
हेल्मेट
Friday, March 19, 2010
Thursday, March 11, 2010
Thursday, March 4, 2010
Monday, February 22, 2010
वैश्विक गिरोह्
वैश्विक होते संसार में
हर ओर अतृप्त इच्छा-लालसा-कुंठाओं की
जलती लाशों से उठती लपलपाती झंझार से
भागता हूँ विशून्य में
थकहार ढूँढ़ता हूँ
पेशल रात को
उसकी
अंकोर में सिर रख सो जाना चाहता हूँ
उमगती भोर तक;
कि तभी
ठकमुर्री से देखता हूँ
दिगंत-व्याप्त-रात की लोनाई लीलती
ठसक-भरी शबल रोशनियों में
विलीन होते
तारों और चंद्रचाप को,
और सुनकर
चित्तविप्लव में डूबे
सारल्यता को छलते
जनसमूहों के विलज्ज ठहाके
भागता हूँ
उनकी घूरती अपलक आखों से दूर
फ़क़त रात की तलाश में
और छलक आते हैं आँसू
अभी भी झपकता हूँ मैं पलकें कि तभी
खेंच लेती है कोई अदृश्य शक्ति
वैवर्त-सा घूमता हूँ अपनी ही धुरी में
झड़ जाती हैं पलकें
और शामिल हो जाती मैं भी
अपलक आँखों के गिरोह में ।
प्रणव सक्सेना
Amitraghat.blogspot.com
Wednesday, February 17, 2010
Saturday, February 13, 2010
Friday, February 12, 2010
शलाम शाब
धुँधलके को तोडती हुई
वह आवाज़
”शलाम शाब”
”दीवाली का इनाम शाब”
और सस्मित आ खड़ा हुआ फिर सलाम ठोकता
मालदार महाशयों के बीच जी रहा
हज़ारों किमी दूर थानकों से अभिनिष्क्रमित
तथागत की जन्म स्थली का वह वामन युवा
चुपचाप देखता कई दिनों का रखा
उपयोगितावादी पड़ोस का आडम्बर और मुँह चिढ़ाते
5-5- रूपये के दो सिक्के
रात की सी खामोशी आँखों में भरे
सलाम ठोकता चौतरफ गूँजते मौन को पीछे छोड़
ओझल हो जाता है कि सहसा फिर दीखता है
सींखचों के पार चोरी के आरोप में
लिये वही स्मित वही शलाम और थका संवाद
”हज़ार रूपये के वास्ते”
समर्थन
”सिर्फ हज़ार” (आश्चर्य)
मौन
”सिर्फ हज़ार(घृणा)
विस्मय
”छिह........छी.........,।“
विद्रूप हँसी हँसता गुम हो जाता है बेइलाज
दम तोड़ चुकी माँ की याद लिये कि तभी
फिर प्रकट हुआ अलग वेश में
हास्य मंचों पर
सामूहिक ठहाकों से पिटता
मातृभू के उपहास से आहत
सिर झुकाए मुस्काता
जीवन की तलाश में पराये देश आया वह
लौट जाता है चुपचाप
बागमती* की पनाह में.... ।
बागमती- नेपाल देश की नदी
प्रणव सक्सैना amitraghat.blogspot.com
Thursday, February 11, 2010
शुरूआत
जीवन से ऊबकर व्यवस्था से निराश
चट्टान के कगर पर खड़ा
सामने वितत-विशाल-औंडा-ताल
पूछा स्वयं से,”सोच ले फिर से,
क्या मरना ज़रूरी है?”
”हाँ,” -दू टूक-सा दिया मैंने उत्तर
और कूद पड़ा झट से;
तीखी थी छलाँग, ताल ने भी नहीं मचाया शोर
ना ही कहीं उठी हिलोर
व्यवस्था को पता ही नहीं चला
कब मैं मर गया ।
निष्ठ्यूत पीक की तरह
ताल ने भी तत्काल मुझे उगल दिया
और पानी की थिर ज़मीन पर मैं आ लगा
मेरी लोथ पर किसी का भी नहीं ध्यान था
कुछ बोटिंग मे मग्न थे
कुछ लड़कियों की बातों में रमे
तो कुछ मच्छियों की ताक मे दूरतर
फैला रहे थे जाल
मैं स्तब्ध था
सनातन परम्परा की अवहेलना से अवाक
उस घिर आई रात में ताल से भी निकाला गया
तट के कीचड़ मे औंधा कई रोज़ पड़ा रहा
लावारिसों की तरह
न कोई मक्खी आई
न कोई गिद्ध
न चींटियाँ
न पुलिस न संबधी न समाज
न ही व्यवस्था चरमराई
मैं फूट-फूटकर बिखर गया
जीवन भर जानबूझकर अपदस्थ किया गया
मृत्यु पश्चात ऐसा तिरस्कार
मैं मर कर भी निराश रहा
कि तभी दृष्टि-परिधि के अंत में
कुछ छवियाँ तिर आई
वह वृक्ष तल का क्षौरिक, वह पौरिया,वह घुरबिनिया, वह बेडनी,
वह बूढा खींचता था जो असबाबी ठेला खड़ी चढ़ाई पर
अंत में सबों को चीरकर रोम का वह गुलाम
स्पार्टकस* एक थ्रेसियन,
जिसने जीवन को भोगा, व्यवस्था को समझा
जिसके लिये जीवन-विरूद्ध न कोई प्रश्न था न कोई तर्क
वरन कुछ था तो मात्र आशाओं के फ़लक-बोस-हर्म्य
हुलासित हृद्य हुलालित अंतःकरण
और जीवन के प्रति अगाध प्रेम,
वे सब आए बिना बोले सस्मित,मैने देखा,महसूस किया
हर ओर हर जगह हर देश में
स्पार्टकस फैले पड़े हैं जो मरकर भी जीते हैं
संघर्ष करते हैं सिर्फ जीते हैं
अब मैं चुप था, उदास; किंतु दशमलव मात्र भी नहीं निराश,
रात कट चुकी थी भोर उमग रही थी
सहसा एक अज्ञात चेतना से देह हिल उठी
कहीं हवा लहराई, जीवन की तलाश में हवा के विपरीत
आकर्षित गंधानुसरण करतीं कुछ डायोप्टैरंस*
मेरे कानों में भिनभिना उठीं,
आंतरिक अपघटन आरंभ हो चुका था,
मैं बजबजा रहा था , संभवतया यही मेरा प्रायश्चित था
यही शुरूआत..........।
स्पार्टकस – हावर्ड फ़ोस्ट की कालजयी कृति आदि विद्रोही का नायक
डायोप्टैरंस - शव पर सबसे पहले-पहल आने वाली मक्खियां
प्रणव सक्सेना amitraghat.blogspot.com

















