Wednesday, February 3, 2010

हम्माल

हम्माल

उस

सियाले में

अकस्मात

जंगल की हवा में समाहित

वनद्रुमों की मदनीय सुवास से

नहाई शाम में

घर लौटे

धुलिया-मिटिया,धुरिया-धुरंग

लगढग नग्न

लीतड़ा पहने

युगों से विशाल भार को काँधें लिये

आदिम रहस से भरे अंतस की

पहरेदारी करता

वह हरहठ

युवा हम्माल

जिसकी सुदृढ़ माँसपेशियों से ढिरते

श्रमबिन्दुओं से तरबतर देह पर आप्यायित

कीटाणुओं से उपजी दुरबास और मुख से आती

गहन सिसियाँद से बेपरवा

सिहरती-सी हसरतों से उसे देखकर

उस के जाँगर पर आसक्त

वह मदिर वरवर्णिनी जिसकी

उत्तप्त श्वाँसों से आप्लुत वह

पसीनाई चेहरा

जिस पर झुकती है वह

साँझ की तरह

दूर-तर छितरी जुन्हाई से झल-झल मदभरी रात में

और डूब जाता है वह युग्म

प्रेम के गहन पुरातन पाश में।

प्रणव सक्सेना

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