Monday, February 22, 2010

वैश्विक गिरोह्

वैश्विक होते संसार में

हर ओर अतृप्त इच्छा-लालसा-कुंठाओं की

जलती लाशों से उठती लपलपाती झंझार से

भागता हूँ विशून्य में

थकहार ढूँढ़ता हूँ

पेशल रात को

उसकी

अंकोर में सिर रख सो जाना चाहता हूँ

उमगती भोर तक;

कि तभी

ठकमुर्री से देखता हूँ

दिगंत-व्याप्त-रात की लोनाई लीलती

ठसक-भरी शबल रोशनियों में

विलीन होते

तारों और चंद्रचाप को,

और सुनकर

चित्तविप्लव में डूबे

सारल्यता को छलते

जनसमूहों के विलज्ज ठहाके

भागता हूँ

उनकी घूरती अपलक आखों से दूर

फ़क़त रात की तलाश में

और छलक आते हैं आँसू

अभी भी झपकता हूँ मैं पलकें कि तभी

खेंच लेती है कोई अदृश्य शक्ति

वैवर्त-सा घूमता हूँ अपनी ही धुरी में

झड़ जाती हैं पलकें

और शामिल हो जाती मैं भी

अपलक आँखों के गिरोह में ।

प्रणव सक्सेना

Amitraghat.blogspot.com

Wednesday, February 17, 2010

CARTOON on cross examination of RAPE VICTIM


Saturday, February 13, 2010

भारत भवन की 28 वे स्थापना दिवस पर मेरे द्वारा रचित कार्टून

Friday, February 12, 2010

शलाम शाब

धुँधलके को तोडती हुई

वह आवाज़

शलाम शाब

दीवाली का इनाम शाब

और सस्मित आ खड़ा हुआ फिर सलाम ठोकता

मालदार महाशयों के बीच जी रहा

हज़ारों किमी दूर थानकों से अभिनिष्क्रमित

तथागत की जन्म स्थली का वह वामन युवा

चुपचाप देखता कई दिनों का रखा

उपयोगितावादी पड़ोस का आडम्बर और मुँह चिढ़ाते

5-5- रूपये के दो सिक्के

रात की सी खामोशी आँखों में भरे

सलाम ठोकता चौतरफ गूँजते मौन को पीछे छोड़

ओझल हो जाता है कि सहसा फिर दीखता है

सींखचों के पार चोरी के आरोप में

लिये वही स्मित वही शलाम और थका संवाद

हज़ार रूपये के वास्ते

समर्थन

सिर्फ हज़ार (आश्चर्य)

मौन

सिर्फ हज़ार(घृणा)

विस्मय

छिह........छी.........,।

विद्रूप हँसी हँसता गुम हो जाता है बेइलाज

दम तोड़ चुकी माँ की याद लिये कि तभी

फिर प्रकट हुआ अलग वेश में

हास्य मंचों पर

सामूहिक ठहाकों से पिटता

मातृभू के उपहास से आहत

सिर झुकाए मुस्काता

जीवन की तलाश में पराये देश आया वह

लौट जाता है चुपचाप

बागमती* की पनाह में.... ।

बागमती- नेपाल देश की नदी

प्रणव सक्सैना amitraghat.blogspot.com

Thursday, February 11, 2010

शुरूआत

जीवन से ऊबकर व्यवस्था से निराश

चट्टान के कगर पर खड़ा

सामने वितत-विशाल-औंडा-ताल

पूछा स्वयं से,सोच ले फिर से,

क्या मरना ज़रूरी है?

हाँ, -दू टूक-सा दिया मैंने उत्तर

और कूद पड़ा झट से;

तीखी थी छलाँग, ताल ने भी नहीं मचाया शोर

ना ही कहीं उठी हिलोर

व्यवस्था को पता ही नहीं चला

कब मैं मर गया ।

निष्ठ्यूत पीक की तरह

ताल ने भी तत्काल मुझे उगल दिया

और पानी की थिर ज़मीन पर मैं आ लगा

मेरी लोथ पर किसी का भी नहीं ध्यान था

कुछ बोटिंग मे मग्न थे

कुछ लड़कियों की बातों में रमे

तो कुछ मच्छियों की ताक मे दूरतर

फैला रहे थे जाल

मैं स्तब्ध था

सनातन परम्परा की अवहेलना से अवाक

उस घिर आई रात में ताल से भी निकाला गया

तट के कीचड़ मे औंधा कई रोज़ पड़ा रहा

लावारिसों की तरह

न कोई मक्खी आई

न कोई गिद्ध

न चींटियाँ

न पुलिस न संबधी न समाज

न ही व्यवस्था चरमराई

मैं फूट-फूटकर बिखर गया

जीवन भर जानबूझकर अपदस्थ किया गया

मृत्यु पश्चात ऐसा तिरस्कार

मैं मर कर भी निराश रहा

कि तभी दृष्टि-परिधि के अंत में

कुछ छवियाँ तिर आई

वह वृक्ष तल का क्षौरिक, वह पौरिया,वह घुरबिनिया, वह बेडनी,

वह बूढा खींचता था जो असबाबी ठेला खड़ी चढ़ाई पर

अंत में सबों को चीरकर रोम का वह गुलाम

स्पार्टकस* एक थ्रेसियन,

जिसने जीवन को भोगा, व्यवस्था को समझा

जिसके लिये जीवन-विरूद्ध न कोई प्रश्न था न कोई तर्क

वरन कुछ था तो मात्र आशाओं के फ़लक-बोस-हर्म्य

हुलासित हृद्य हुलालित अंतःकरण

और जीवन के प्रति अगाध प्रेम,

वे सब आए बिना बोले सस्मित,मैने देखा,महसूस किया

हर ओर हर जगह हर देश में

स्पार्टकस फैले पड़े हैं जो मरकर भी जीते हैं

संघर्ष करते हैं सिर्फ जीते हैं

अब मैं चुप था, उदास; किंतु दशमलव मात्र भी नहीं निराश,

रात कट चुकी थी भोर उमग रही थी

सहसा एक अज्ञात चेतना से देह हिल उठी

कहीं हवा लहराई, जीवन की तलाश में हवा के विपरीत

आकर्षित गंधानुसरण करतीं कुछ डायोप्टैरंस*

मेरे कानों में भिनभिना उठीं,

आंतरिक अपघटन आरंभ हो चुका था,

मैं बजबजा रहा था , संभवतया यही मेरा प्रायश्चित था

यही शुरूआत..........।

स्पार्टकस – हावर्ड फ़ोस्ट की कालजयी कृति आदि विद्रोही का नायक

डायोप्टैरंस - शव पर सबसे पहले-पहल आने वाली मक्खियां

प्रणव सक्सेना amitraghat.blogspot.com

Saturday, February 6, 2010

मनोभिलाष

सवेरे का वक्त था,

आसमान कुछ आर्द्र, हल्का नीला

हरित पत्तियों पर ठिठकी

नन्हीं-नन्हीं जल की कुछ बूँदें,

प्रकृति की सुघड़-स्वच्छ घटा में

बारिश की आड़ी-तिरछी-फुहार

मदोन्माद से बहता खुला-खुला-सा निरंकुश नाला

सुदूर पूरबी क्षितिज से झाँकते

धुँधले नीले पहाड़,

तब भी सड़कों पर पसरा अंधेरा,

जैसे झुट्पुटे के वक्त,

मलिष्ठ सड़कें

जलाचित बिखरे गड्ढे

मकानों से निकलता यहाँ-वहाँ पड़ा

कूड़े-करकट का ढेर

और बिखरता धूम;

सामने दीवार फाड़ते

पीपल की निर्वसना शाख पर

पराबध्द कुछ कौवे

नीचे ओहत कुकुर की सड़ती लोथ

वहीं पीछे छूटती

अभावमंडित

एक नीची छत की इमारत

बहुत छोटी और कुरूप

कुछ वर्गफुटों की

नितांत अकथनीय ।

अकस्मात !!!

खुला उसका कवाट

निकली एक पीवरी सद्यस्नात

धरे सिर पर पल्ला

ग्रह की सरल परिधि को लाँघ

आभा-परिहित-दमक रहा आनन उसका

भरिभाल पर झूलते मूँज से बाल,

सवत्स; जा रही हो जैसे मन्दिर

भग्न-प्रतिमा-सी तल्लीन

था जिसमे सहज समर्पण

अहं-मुक्त-भावों में लीन ।

पहन पीत वर्ण की साड़ी कस के पकड़े

यथा खींच लगाम, करें नियंत्रित

कर्दम-निमग्न-निगुंफित-हरित-बिछावन

पर धर अलक लगाए नंगे पाँव,

पड़े जिसमे कलरव करते नुपूर-युग्म,

निराशा में ज्यों विवर्धित हो प्रकाश

तेज होता उत्तरोत्तर बिन्दुकलनिनाद ।

भर उफाल

कर गई पार

वह कुछ मोड़ों के कटान,

अभिमुख उसके एक बस स्टॉप,

वही था उसका मन्दिर, शुभ स्थान;

यातायात के उस अवज्ञात चिह्न पर लगा

तिलक अक्षत हुई वह नतमस्तक, कर प्रणाम

बैठ दंडवत, हो भावों में अभिरत करा विचार विगत का,

-कल मिले थे यहीं कुछ ग्राहक, आज भी

करना वही क्रपा हे ईश तुम मुझ पर-

भर आये उपात अवरूद्ध हुआ कंठ चूम ललन का ललाट बोली,

अयाचित से कुछ अधिक ही पाया, तेरे प्रसाद को भी समझा निर्माल्य,

विलोक जब पुत्र के लिलार पर पड़ती मेरे कर्मों की प्रतिच्छाया

फूले थे हाथ-पाँव लगा भविष्य अंधियारा,तब विसर्जन का भी

एक बार उपजा विचार पर देख उस नवजात की

सहज-सलोनी-चितवन भूल बैठी मैं

समस्त जग के भावी चिंतन

हुए अंतर्हित वे गत विचार, फैल उठे आशाओं

के हर्म्यस्थलों के अंतहीन विस्तार;

यहाँ पुत्र ही मेरा संबल, जीवनाधार,है अब ध्येय

एकमात्र हो इसका श्रेष्ठ-उत्तम-विकास

समाज के मुक्त हस्तक्षेप के चलते जो नहीं पा सकी

मैं हतभागी, उससे भी लक्षाधिक देना हे ईश

पुत्र को मेरे, यही बस याचित मनोभिलाष ।

प्रणव सक्सैना amitraghat.blogspot.com

Wednesday, February 3, 2010

हम्माल

हम्माल

उस

सियाले में

अकस्मात

जंगल की हवा में समाहित

वनद्रुमों की मदनीय सुवास से

नहाई शाम में

घर लौटे

धुलिया-मिटिया,धुरिया-धुरंग

लगढग नग्न

लीतड़ा पहने

युगों से विशाल भार को काँधें लिये

आदिम रहस से भरे अंतस की

पहरेदारी करता

वह हरहठ

युवा हम्माल

जिसकी सुदृढ़ माँसपेशियों से ढिरते

श्रमबिन्दुओं से तरबतर देह पर आप्यायित

कीटाणुओं से उपजी दुरबास और मुख से आती

गहन सिसियाँद से बेपरवा

सिहरती-सी हसरतों से उसे देखकर

उस के जाँगर पर आसक्त

वह मदिर वरवर्णिनी जिसकी

उत्तप्त श्वाँसों से आप्लुत वह

पसीनाई चेहरा

जिस पर झुकती है वह

साँझ की तरह

दूर-तर छितरी जुन्हाई से झल-झल मदभरी रात में

और डूब जाता है वह युग्म

प्रेम के गहन पुरातन पाश में।

प्रणव सक्सेना

amitraghat.blogspot.com