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Saturday, February 6, 2010

मनोभिलाष

सवेरे का वक्त था,

आसमान कुछ आर्द्र, हल्का नीला

हरित पत्तियों पर ठिठकी

नन्हीं-नन्हीं जल की कुछ बूँदें,

प्रकृति की सुघड़-स्वच्छ घटा में

बारिश की आड़ी-तिरछी-फुहार

मदोन्माद से बहता खुला-खुला-सा निरंकुश नाला

सुदूर पूरबी क्षितिज से झाँकते

धुँधले नीले पहाड़,

तब भी सड़कों पर पसरा अंधेरा,

जैसे झुट्पुटे के वक्त,

मलिष्ठ सड़कें

जलाचित बिखरे गड्ढे

मकानों से निकलता यहाँ-वहाँ पड़ा

कूड़े-करकट का ढेर

और बिखरता धूम;

सामने दीवार फाड़ते

पीपल की निर्वसना शाख पर

पराबध्द कुछ कौवे

नीचे ओहत कुकुर की सड़ती लोथ

वहीं पीछे छूटती

अभावमंडित

एक नीची छत की इमारत

बहुत छोटी और कुरूप

कुछ वर्गफुटों की

नितांत अकथनीय ।

अकस्मात !!!

खुला उसका कवाट

निकली एक पीवरी सद्यस्नात

धरे सिर पर पल्ला

ग्रह की सरल परिधि को लाँघ

आभा-परिहित-दमक रहा आनन उसका

भरिभाल पर झूलते मूँज से बाल,

सवत्स; जा रही हो जैसे मन्दिर

भग्न-प्रतिमा-सी तल्लीन

था जिसमे सहज समर्पण

अहं-मुक्त-भावों में लीन ।

पहन पीत वर्ण की साड़ी कस के पकड़े

यथा खींच लगाम, करें नियंत्रित

कर्दम-निमग्न-निगुंफित-हरित-बिछावन

पर धर अलक लगाए नंगे पाँव,

पड़े जिसमे कलरव करते नुपूर-युग्म,

निराशा में ज्यों विवर्धित हो प्रकाश

तेज होता उत्तरोत्तर बिन्दुकलनिनाद ।

भर उफाल

कर गई पार

वह कुछ मोड़ों के कटान,

अभिमुख उसके एक बस स्टॉप,

वही था उसका मन्दिर, शुभ स्थान;

यातायात के उस अवज्ञात चिह्न पर लगा

तिलक अक्षत हुई वह नतमस्तक, कर प्रणाम

बैठ दंडवत, हो भावों में अभिरत करा विचार विगत का,

-कल मिले थे यहीं कुछ ग्राहक, आज भी

करना वही क्रपा हे ईश तुम मुझ पर-

भर आये उपात अवरूद्ध हुआ कंठ चूम ललन का ललाट बोली,

अयाचित से कुछ अधिक ही पाया, तेरे प्रसाद को भी समझा निर्माल्य,

विलोक जब पुत्र के लिलार पर पड़ती मेरे कर्मों की प्रतिच्छाया

फूले थे हाथ-पाँव लगा भविष्य अंधियारा,तब विसर्जन का भी

एक बार उपजा विचार पर देख उस नवजात की

सहज-सलोनी-चितवन भूल बैठी मैं

समस्त जग के भावी चिंतन

हुए अंतर्हित वे गत विचार, फैल उठे आशाओं

के हर्म्यस्थलों के अंतहीन विस्तार;

यहाँ पुत्र ही मेरा संबल, जीवनाधार,है अब ध्येय

एकमात्र हो इसका श्रेष्ठ-उत्तम-विकास

समाज के मुक्त हस्तक्षेप के चलते जो नहीं पा सकी

मैं हतभागी, उससे भी लक्षाधिक देना हे ईश

पुत्र को मेरे, यही बस याचित मनोभिलाष ।

प्रणव सक्सैना amitraghat.blogspot.com

Wednesday, February 3, 2010

हम्माल

हम्माल

उस

सियाले में

अकस्मात

जंगल की हवा में समाहित

वनद्रुमों की मदनीय सुवास से

नहाई शाम में

घर लौटे

धुलिया-मिटिया,धुरिया-धुरंग

लगढग नग्न

लीतड़ा पहने

युगों से विशाल भार को काँधें लिये

आदिम रहस से भरे अंतस की

पहरेदारी करता

वह हरहठ

युवा हम्माल

जिसकी सुदृढ़ माँसपेशियों से ढिरते

श्रमबिन्दुओं से तरबतर देह पर आप्यायित

कीटाणुओं से उपजी दुरबास और मुख से आती

गहन सिसियाँद से बेपरवा

सिहरती-सी हसरतों से उसे देखकर

उस के जाँगर पर आसक्त

वह मदिर वरवर्णिनी जिसकी

उत्तप्त श्वाँसों से आप्लुत वह

पसीनाई चेहरा

जिस पर झुकती है वह

साँझ की तरह

दूर-तर छितरी जुन्हाई से झल-झल मदभरी रात में

और डूब जाता है वह युग्म

प्रेम के गहन पुरातन पाश में।

प्रणव सक्सेना

amitraghat.blogspot.com

Friday, January 22, 2010

माँ के बारे मे

माँ के बारे मे

जाने कैसे??? उन्हें

पता चल गया कि मैं एक कवि भी हूँ

आदमी होने के अलावा

और फिर तब,

-नक्सलियों ने

-फिदायीनों ने

-आत्मघातियों ने

सबने

समवेत होकर

मोबाइल पर मैसेज किया

कि मुझे कविता सुनानी है

उनके बीच

-प्रेमभरी

-वासनामयी

जिसमे ज़िक्र हो लड़कियों का बेसाख़्ता..

और हो सके तो कुछ

लड़कियाँ भी ले आना,

जो स्टेशन किनारों पर

इशारों से बुलाती हैं............अक्सर.....।

पर.......

मैं पहुँचा खाली हाथ,

तलाशी में मिला उनको

-कविताओं का सिर्फ बन्डल

और खाने का छोटा-सा डब्बा,

वे ले गए मुझे

एक ओर

कैंप से दूर

चुपचाप.....

उनकी मूछें थीं हल्की-सी

वो दुबले थे पतले थे और कड़ियल भी

उनकी जेबें RDX से भरी थी

उन्होने सुनना चाहा वो, जो मैं लाया था

और फिर कई घंटों तक वे सुनते ही रहे

मेरी कविता......

जिसमे एक लड़की थी,बेहोश मगर सुन्दर

उसका गुदाज़ जिस्म

उसकी लरज़िश

बेहिसाब उसके चुम्बन,

ले गया मैं उनको प्रेम की सुरम्य वादियों में,

वासना के बीहड़ मे,

मगर वे चुप ही रहे.....शांत,

न कोई क़हक़हे

न कोई तालियाँ

न कोई मदहोशी

न ही अभिनन्दन,

था तो सिर्फ विस्मयी सन्नाटा

और प्रश्न पूछ्ती वे सर्द आँखें

माँ के बारे मे कभी लिखते हैं बड़े भाई ?

.........................और......................।

भर आई मेरी आँखें देख उन्हें

हाथों मे कसके दबाए मेरी माँ की रोटियाँ

-देख रहे हों जिसमे शायद अपनी माँ का अक्स

-सूँघ रहें हों जैसे अपनी माँ की महक

और.......और.......और.............

फिर मैं चल दिया.

और चलते-चलते दौड़ता ही रहा उस रात

एक कगार से दूसरे तक.........।

प्रणव सक्सेना amitraghat.blogspot.com

Saturday, January 9, 2010

मुर्गा

मुर्गा
हर एक जन्मदिन पर मेरे
मुर्गा कटता है।
उसकी गर्दन पर
आहिस्ता-आहिस्ता फिरती छुरी
को महसूस किया जाता है अक्सर
खाना खाने के फौरन बाद
और मर्सिया गाता है पूरा परिवार;
फिर उसकी चबी हड्डियों को बचे चावल को और
गंधाती प्याज को फेंक देते हैं
पालतू कुत्ते के सामने लप-लप खाने के लिये;
रात भर जी भर के आती हैं
डकारे और सपने में दिखता है मुर्गे का तड़पना...
और .....सुबह होते ही
जुट जाते हैं हम सब
बचा हुआ मुर्गा खाने के लिये
क्योंकि सीज जाता है वह तब तक..।
प्रणव सक्सेना “amitraghat.blogspot.com”

Thursday, January 7, 2010

तरुणाई के पार

उस
तरूणाई के अंतिम पहर
जब मैने उसे
ठठाते-उछलते-कूदते-धप-धड़ाम
गिरते उठते देखा था
मगर
सरलता के अवसान
की उस घड़ी
के साथ ही
वह लड़का अब बड़ा-सा दिखता है
शबल पृष्ठों से भरी मेगज़िन को वह
बेहिचक पीछे से पलट
सस्मित देखता है !

Sunday, October 4, 2009

महंत (लुप्त होते देहाती शब्दों की नाट्य कविता)

जाने कऊन महोत्सव में
मदभरी फगुनहट में
ढाक तले आ जुटे अहा! देखो,
कुल-छोटे-बड़े-पदहैसियतानुसार- क्रमबद्ध

खुरदुरे-ठठाते-चुप्पे-चकमे-बदमस्त
बोली कसते भोले-भाले,
हज्जार-पानसो-सौ-पच्चास-बीस-दस-पाँच-दो
और एक के नोट और संग कछु कलदार

फिर आगे बढ़-बढ़ हुई जोहार
कि खिंच गया तभई सन्नाटा
आये थे सभी बनने महंत
झटपट हुआ आरम्भ तब बिरता परदरसन;
सर्वप्रथम मौन तोड़ता अरे...रे..रे..रे...रे..देखो,
उठा वह पलीद पचासा,”बार गरल पर मैं लुटा था,
चोलिया में भी एक बार ठुँसा था,मुझे बनाओ महंत
मिलेगा सबो को परमानन्द.....।“
(भीड़) “अये...हय...हा..हा...हा...अ...हा...हा..वा..ह..ह....”
कि झट खड़े हुए उखड़े केसरिये कलदार
”महंत बनबे का हमार नैतिक अधिकार

भगाओ इसे हियन से फैला रहा बेभिचार....।“
“,अरे.....रे....रे....रे...ऊ....आक...थू...”बलगम थूकता
उठा पिलास्टर बांधे भदरंगा पाँच ,
“बनाओ मुझे महंत मेरी है चलती की बेरी
कर दो मेरी बस अंतिम इच्छा पूरी ....।“
”च्च... च्च...च्च...च...बैठ जाओ चच्चा.....”
बोला बीड़ी फूँकता अधेला

“हाँ....हाँ.....” सीड़ निकालती बोली
लुप्तप्राय–भूली बिसरी चौअन्नी
के तभी उठा लड़खड़ाता–सकसकाता
संझवाती जलाती गंवई स्त्री के हाथोँ मे दबा

सप्ताह भर की सब्जी के लिये बना
वह भकुआ दस का नोट
जाने क्या बोला क्या बुदबुदाया
कि तभी कूद पड़ा वह जूँमुहाँ युवा बीस
जबरन निपोरते खीस , हुलसकर बोला,
“बच्चों का हूँ मैं यार आती मुझसे
डेरी मिलक दो पीलीज़ मुझे मुखिया बना दो.....।“ (भीड़)”हो...हो...हो...हो...टूँ...टूँ...खी...खी...खी....”
सूखे पात फेंक उसे भगाया,
अब की उठा इंगरेजी बूकता हज्जार

सबों को निबेरता महंत का मजबूत दावेदार
अ...ह...ह...ह...चेहरे पर नेतई मुस्कान
क्या ठसक वाह-वाह क्या टिमाक

सगलगी करते संग उसके पानसो और बुर्जवा सौ
नजरों से छानकर थानक पूछा,
”अरे कहाँ गये वे नोट एक और दो....?”
यकायक गह्वर-सी चुप्पी तोड़्ते
उठ खड़े हुए वे बामन नोट

राह खड़ी भीड़ चीरकर चल पड़े हौले-हौले
मंच की ओर, रूँधी आवाज से बोले,
”हमसे (ओहो..) होती (अच्छा...) बोटों की
बारिस (खी...खी...खी...) बनती हमऊ से (महजी नमस्ते॥) सरकार क..क्योंकि

हम॥म।से मिलता रासन का एक किलो
घुना-गेंहू-लाल, भरते इसी से एक समय का पेट
बनाइये हमें ..महंत..हम..म..म.....................”
छा गई निस्तब्धता, थम गई पुरवाई

था केवल पत्तों का मर्मर
कि तभी ताव खाए पानसौ को रोककर
पूछ बैठा हज्जार चौंककर,
”ऐं...??...??...एक किलो घुना गेंहू वह भी लाल...

वाह-वाह सरकारी ढोरों का क्या खूब है कमाल...।“
फिर भर आई आंखें पोंछ्के

ले हाथों मे चुटकी भर गुलाल और टेसू की शाल,
”धन्य हो दद्दा सच्च में तुमहई हो महंत के काबिल
एक बेर का ही सही देते तो हो नया जीवन........।“

(भीड़) “हाँ....हाँ.....हाँ सच है ऐं ही है मुखिया के काबिल हो...हो हो..”।
और बज उठे दमामे–घन्ट–घड़ियाल होने लगी
जै जकार; बहने लगी फिर से मद भरी बयार
सर्र....र्र....र्र....र्र....सर्र....र्र....र्र....र्र....साएँ....साएँ....।
प्रण्व सक्सेना “अमित्रघात”
Amitraghat.blogspot.com

Tuesday, August 25, 2009

सेल्समेन

सेल्समेन
घास के विराट मैदानों की तरह
फैली सर्द रात के सन्नाटे
को चीरती है
- जैसे लकडहारे चीरतें हैं लकड़ी
-उसकी माँ की चीख
और हम सब बड़ जातें हैं
पोस्ट - मार्टम कक्ष मैं
मेरे सामने ही होता है शव विच्छेदन
और निकलती है उसमें से
-ढेरों मन गालियाँ
-दुस्तर लक्ष्य
-अंतहीन दबाव
-असंखय गुटकों के पाउच
-"कुत्तों से सावधान ""सेल्समेन आर नोट एलाऊड की पट्टियाँ"
तिरस्कार से बंद होते दरवाजों की आवाज
और ..........................और...............................और
एक कोने मैं दबे कुचले सहमे माँ के कुछ सपने ;
"आखिरी बार कब हंसा था ?
"मरने से कुछ देर ही पहले "
गीली रात ढलती है
भौर उमग रही है
रोशनियाँ पीली पड़ने लगती हैं

लम्बोदर

लम्बोदर
गिरती महीन जलराशि - मध्य
उस लम्बमान ताल उपात से सटे
संकुल वृक्षों की लसस डालियों
के पत्र्पुन्ज से आवृत स्थल पर
कार स्कूटर ट्रक ट्रालियों मैं
विराजित - विसर्जन के लिए
बाट जोहते लम्बोदर असंख्य - जनों के संग
अकस्मात
चीरकर
वह पगलाई स्त्री
ताल की अथाह गहराई मे चलते चलते
डूब गई उसके कांधे पर उसका
लम्बोदर था जो
भूख से तड़पकर
उसी दिन अंकोर मे सर रख कर
मरा था

राजा बुश

राजा बुश
हतप्रभ है वह
पश्चाताप -हीन व्यवस्थित अपराधी
रजा बुश कि
कैसे चल सकता है मुकदमा उन पर
क्या राज प्रसाद से पाई गई
एक मुर्गी के पर चबी हड्डियाँ और खून के छींटें से
मुकदमा बनता है ?
फ़िर भी राजा बुश पर चला-
--मुर्गी को क्या आपने काटा था राजा बुश
नहीं मरोड़ा था बेरहमी से-
--क्या आपने पर नोचने के लिए गरम पानी किया था ?
नहीं मैंने चुनचुन कर एक एक पर खींचा था
जब वह जिंदा थी-
--क्या किया फ़िर
शोरबा निकाला उसका -
--फ़िर पिया
फ़िर..............फ़िर..................
।उसकी हड्डियों को चबाया
--फ़िर क्या आपने पुट्ठों पर हाथ झाड़ कर चल दिए
नहीं कतई नहीं मैंने पुट्ठों पर हाथ नहीं झाडे
मैं एक कोने मैं बैठ गया
मेरे जेहन मैं मुर्गी थी
मैं खूब देर तक रोया ; उसकी मौत पर
फ़िर मैंने एक कविता लिखी
आसुओं मैं डूबी ,
--आपने कविता लिखी राजा बुश
हाँ (स्वर भर्राया था )
आप बरी किए गए राजा बुश