Thursday, September 25, 2008

माँ

जाड़े की रात्री मैं ठिठुरती - कांपती
सूखे पत्र - सी हिलती , उकडूं बैठ
निहारती छप्पर को , कहाँ से आती ये हवा सोचती ;
पर न दिखा सामने पटविहीन पट
जहाँ से प्रवेश करती बेधड़क , निर्लज्ज हवा
विशाल अट्टालिकाओं के प्रशस्त उष्ण
प्रकोष्ठों से पिटी दिखा रही दादागिरी
मेरी माँ की पीठ खुली मगर कान तक ढकी साड़ी ,
बेलबूट की जगह ,छपे असंख्य छिद्र जिसमे अंत तक
दुर्बल काय मेरी माँ
पर प्रसारित - प्रशस्त बाहुपाश उसके ,
प्रगाढ़उष्णता से भरी करती स्वागत नित्य
लौटा जब मैं विकल ; समीप राखी शाँल
उड़ा
मुझे प्यार से कांपती उठती वह सुघड़
परोसती खाना मुझे एक रोटी व कुछ दाने दाल के ;
फिरती हाथ पुचकारती कहती "ले
बेटा बची आज एक ही रोटी खा गई में
निठल्ली पूरी पाँच बेठी बेठी "
अन्तिम निगल ग्रास शोण का माँ के हित
तनिक भी तो न कर सका ;लाख योनियोपरांत
देह मिली तो क्या जीवन बीते अभावों में
प्रारब्ध के विराम तक
धिक्कार है मुझ पर इन बाहुओं के बल पर
देख माँ को कोने मैं जो लेटी थी जो बरफ की शिला
सी ठंडी धरा पर ,
साड़ी को कफ़न सा लपेट
करवटें बदलती ; ओह ! माँ तू मर क्यों नहीं जाती ?
क्यों भुगत रही पीड़ा ,
किस प्रत्याशा से दांव लगाय बैठी मुझ निरुत्साही
पर ; सहसा चोंक पड़ा मैं इस निज कुत्सित विचार से
अंतरात्मा ने भी धिक्कारा , सोच माँ की
अविधमानता छलक उठे नयनों से अश्रु
समस्त देह के अवयव थर - थर काँप उठे
इस निज कुत्सित विचार से
आया मैं बाहर उठे बोझिल कदम
ध्वांत मैं विलोक फलक पर टिमटिमा
रहा तारा वाही एक मात्र कर रहा था जो अकेला ही तम् परिहार ,
मानो कह रहा हो मुझसे
माँ के विश्वास पर धर विश्वास तू होगा
प्रत्यस्त गमन इस अन्धकार का का एक दिवस
आएगा हँसता हुआ नव विभात ,खिलखिलाती रश्मियों का होगा
सतत् पर्यास " हाँ ठीक ही समझा
मैं इस दूरागत विचार को माँ के
ललाट को चूम कर उड़ा उसे शाँल
जुट गया मैं सुखद भविष्य की कल्पना को
साकार करने

Wednesday, September 24, 2008

मेरी बेटी

आसढ़ का दिन था चारों और फैले बादलों के थान
और बारिश की गिरती रिमझिम फुहार ओसारे में खड़ी
उत्फुल्ल थी लली माँ गई थी बाजार खिन में लिया उसने ठान
चुन्नी को फैंट बाँहों को चढ़ाया
जैसे तैसे साना आटा टूटे कुछ नाखून हुई
दुखी पर फ़िर से काम में वह जुटी
परात में जमाया परथन निकाला
लोई बनाई भली सी गोल कुछ बेडोल चकले पर बेला
पर वह उच्छृंखल सबके समक्ष बुर्जुआ
बेलन से लिपटी लली चटकी मुश्किल से किया विलून
किया उह झटपट लोई को परथन मैं
बूड़ाया हाथों पर धर धेर्य चूल्हा जलाया
ईंट की सी भट्टी घिर आया ज्यों जेठ का मौसम
पड़ते लू के थपेडे गुलनार से दप दप दमकते
लली के कपोल गोरे माथे च्यूता बेलिया भर
पसीना गिरता गुस्साए तवे पर छन...............
नीचे जमी मच्छरों की बैठक तभी आया केबीसी
द्वितीय बारी का मन ललचाया पर आया सबका ख्याल
अत: हुई फ़िर से लीन अबके प्यार से
रोटी के चमीटे
से उमेठे कान गर्व से भर खिल उठी रोटियां
पर अब बीरता के सब बाहर हुआ
कटी धर हाथ लली झल्लाई बिंग से हँसतें
बेलन की करी ठुकाई बारिश का यों गिरना
तनिक न भाया माँ की याद सताई
उत्साह का हुआ अंत तभी बजी कालबेल
बेटी खिली दौड़ती हुई आई माँ थी थकी माँ आज मैंने
रोटियां बनाई पर कुछ ही फूली
भाई ने खींच दी चोटी माँ बोली मेरी बेटी
चिबुक पकड़ पिता बोले लली हो गई बड़ी दादी ने
डपटा नहीं सयानी छोटे भाई ने जीभ चिढ़ाई
बड़ा बोला कच्ची थी रोटी बिटिया रूठी
माँ हँसी लड़को डांट
चूम ललाट मन ही मन बोली अब तो तू फंसी
मेरी बेटी

Monday, September 15, 2008

परिवर्तन

ज्ञात नहीं क्यूँ कर भूंकते हैं
विशाल अट्टालिकाओं में विचरते श्वान दल
बनताई - सी निस्तब्धता में पैहम
घर लौटते अथक - निरंतर मेहनत करके
थके हरे शराबी पर जिसको नहीं मिली
आज तय की गई उज्रत
और जो आगे चलकर
लड़खड़ा धड़ाम सा गिर पड़ता है
तब भी उस अर्ध चेतना में
संग्यापराध से उपजी वेदना के उल्लाप मैं
तिरता उकठी - मटियाफूस माँ का स्मरण और बहती
अवशता की लार है
बाहिज जिस पर
सड़कीय कुत्ते टांग उठा
बेझिझक मूतते हैं
और हँसतें हैं मृतात्मा की लाश उठाय
मुर्दे यह देख कर
पर कोई उस अंतस मैं नहीं झांकता
जो ह्रदय द्रावक पीड़ा और भयावह अकिंचनता से भरा है
जो अपनी माँ की के स्वप्नों को पूर्ण करने की
कोशिश में हाड़-तोड़ परिश्रम कर
जी-जान से जुटा है
वे ससीम स्वप्न जो पेट के गुरुत्व से बंधे हैं
जिन्हें पूरे करते करते संझा तक ढल जाती है
और वो बिखर जाता है ,
पर जब वह उठेगा भौर के झुरपटे मैं
हतचेता मैं जब माँ उसे सहलाकर हरुए उठाएगी
तब विलिश्ट कराहती मांसपेशियां मैं
भर नया विश्वास ताकत और विजिगिषा
वह फ़िर जुट जायेगा
परिवर्तन की आशा से





Friday, September 5, 2008

बस-स्टाप

वह
फ़िर आ रही है सर्माएतल्ख मैं
दिगंबर आकाश के नीचे खड़े
उसी बस-स्टाप पर
अलस्सबाह
और जैसे उठा के शटर
छू कर पाँव भगवान के
डिसप्ले मैं रखती है अपने जिस्म को
सदियों पुराना चिथड़ा शाल उतार के
पेट थोड़ा पिचका सा स्तन भी एक और लटका सा
अभी-अभी आई है अघाए शिशु को छोड़ कर
इस भूल से है उदास है
फ़िर भी मुग्ध है याचक शिशु की तृप्त मुस्कान पर ;
इधर गुजरतें हैं सरे राह गुरोह दर गुरोह
विण्डो शोपिंग करते सरीहन
मगर इससे बेपरवाह
समोती है वह ग्राहक के ख्याल
सुबह के नाश्ते दुपहर का भोजन रात का खाना
औ चुल्लू भर नोटों मैं ;
पर जोयों रपटता है दिन पत्ती पर ठिठकी ऑस सा
शहर के पैसार में घुसती सर्द हवा से खाहिफ़
दस्तक देती रात मैं तब भी नहीं औढ़ती
है वह शाल
ढंप जाता है चूंकि जिस्म इससे और गिरा देती ,
बोहनी की जोह मैं अंततः दाम गोश्त के
मगर तब भी वह मायूस है कई रोज से
जगह-जगह जलते चूल्हों
से उठते ध्रूम से
लगती हे भूख हूकता है ह्रदय और गूंजता है रुदन
शिशु का सन्नाटा चीरकर कि तभी
वह देखती है
घर लौट रही थकी हारी एक युवती को
आज सरे नौ कर मैं खिंचतें नजर कि हद तक
और ढलक जाते है आंसू चुपके से
मानवता के पतन पर



वह बूढ़ा

उस कडाके के ठार में उपरनी से टांट ढांपे
डूबा सरापा गर्द में वह जर्जर बूढ़ा
जो रोशनपुरा की खड़ी चढाई पर
सरोसामान से लदा ठेला खींचतें-खींचतें
मन्झियार चढ़ाव आ खड़ा हुआ और टस से मस नहीं हुआ
जिसके सलवटी लिलार से ढलकता है पसीना
और कभी भी वह रपट सकता है
जिसके एक और राह से सटी झुग्गियों में से
अपना सा नाता समझ सब उसे दुबीचा से देखतें हैं
मगर वह अनुभवी अपने में तल्लीन ताजरिब से खड़ा
परिस्थिती को तौलता हैं और तर होती बरोनियों के
सूखने की जोह में ढांस को बजब्र रोकता है
दूबदू जिसके दुतरफा धिन्गाई से धापती
देसी देसावरी गाड़ियों के पल्लड़ और पार्श्व में स्थित
जुगादरी हनुमंत बुतकदा
मुस्लमान होकर भी
चुपके निहुरता है और किसी अज्ञात पुरचक से
ऐंठी पिराती फिल्लियों पर जोर लगा
धूजते पैरों को पुनः थामता है
वह अपने इस जीवन से निरवार होना चाहता है
की तभी अकस्मात
सम्मुख उसके बाट जोहती परित्यक्ता बिटिया
और ठण्ड में ठिरता नंग धढंग धेवता दिखता है
उन्हे देख उसास कर वह पुनश्च जीवन से गस जाता है
और अपने मैं ही कर संलाप
सरिया कर सकत अपनी
जीवन को ठेले पर लादे चल पड़ता है
स्मृति मैं उसके दशकों पूर्व मरी माँ का
उष्ण स्नेह स्पर्श और फीकी अरहर दाल में
मिर्चा का धुंगार तिरता है

क्रांति

उठो,उठाओ पत्थर
मारो फोड़ दो सर सावेग
उनका जिन्होंने उसे
कार मैं खिंचते दूर -देर तक देखा है
जो मुंह दबा हँसतें हैं और
असंख्य किरचों से
बिधि -दहपट -आधी उधडी
देह देखने की त्रीव इच्छा से जुटते हैं ,
जो उसकी करुण टेर
सुनकर भी अनसुना कर
दुरते - दुर्राते निकल गए
और जो
सरिश्ता पांतों में बंकाई से उसे देख कर
उत्तप्त उच्छवसन से दरेरते हाथ हैं
जो फेला समझ
प्रतिरूप उसकी उसके गुजरते ही
हेलकर दरीचों के कांच
ढांपती है तुंरत कनात से
और खटखटाते हैं जो कपट
निस्तब्ध अर्धरात्रि को
नगरवधू मान कर
जो रोक सकते थे मगर रोका नहीं जिन्होंने
परिसरण करती ही रही कदराई
रक्त बन जिन शिराओं में
जो खड़े ही रहे तावत
मृत आत्मा की बजबजाती लाश
काँधे लिए
हैबतनाक चुप्पी ओड़कर
उठो उठाओ पत्थर
मारो फोड़ दो सर सावेग
उनका .....
की तभी तिमिर भेदती आती है आवाज ठक की
बह उठा मृत रक्त मेरे ही कपाल से
और में स्तब्ध डबकोंहा सा जो बीङिया बन एकंग खड़ा था
आहत हो गिर धरा पर सुनता हूँ तुमुल संघोष
आगत क्रान्ति के पदचाप का
उस पत्थर को चूम
दम तोड़ता हूँ
अपने इस अंत पर मुग्ध हुआ जाता हूँ