चिट्ठाजगत अधिकृत कड़ी

Wednesday, May 19, 2010

अहा !

अहा ! कितनी प्यारी–सी लड़की
जो मिली थी मुझे घूरे पर
मृत-अजन्मी
पर फिर भी मैंने
उसे उठाया और
तब आँख खोल वह मुस्काई
जिसमें थीं अनंत सम्भावनाएँ….
मैंने चूम ली उसकी
अर्ध विकसित नाक
और ली ढेर सारी मुफ़त की मिठ्ठियाँ
उसने पकड़ लिया मेरा चश्मा और
खिलखिला उठी,
लोग अब कोनों से देखकर मुझे
अहमक कहते हैं
पर कई आँखें हैं जो
पूछती हैं कि
हँसती हुई कैसी लगती थी
उनकी
बिटिया............

Wednesday, May 5, 2010

चूहा मेरी बहन और रेटकिल

हद्द हो गई !

अब जा के मिला है जेब में,

वो बित्ते-भर का चूहा

जिसे कत्ल कर दिया था बवजह

कई बरस पहले,

मॉरटिन रेटकिल रख के

नहीं, ये विज्ञापन कतई नहीं है

बल्कि ज़रिया था मुक्ति का..........

पर फिर भी

चूहा तो मिला है !

और मारे बू के

छूट रही हैं उबकाईयां

जबकि उसी जेब में

-हाथ डालें-डालें गुज़ारा था मैंने जाड़ा

-खाना भी खाया था उन्हीं हाथों से

-हाथ भी तो मिलाया था कितनो से

तब भी,

न तो मुझे प्लेग हुआ

न ही किसी ने कुछ कहा..........

पर तअज्जुब है कि,

कैसे पता चल गया पुलिस को,

क्या इसलिये कि

दिन में एक दफे जागती है आत्मा,

और तभी से मैं

फ़रार हूँ................,

और भी हैं कई लोग

जो मेरी फ़िराक़ में हैं

जिन्हे चाहिये है वही चूहा,

ये वही थे

जो माँगा करते थे मेरा पेंट अक्सर

इसीलिये मैं नहाता भी था

पेंट पहनकर,

(था न यह अप्रतिम आईडिया..)

पर,

अंततः मैं पकड़ा जाता हूँ.....

ज़ब्ती-शिनाख्ती के

फौरन बाद

दर्ज होता है मुकद्दमा

उस बित्ते से चूहे की हत्या का,

और हुज़ूर बजाते हैं इधर हथौड़ा

तोड़ देते हैं वे

अप्रासंगिक निब को तत्काल

और मरने के स्फीत डर से बिलबिला जाता हूँ मैं

कि तभी ऐन वक्त पर

पेश होती है

चूहे की पीएम रपट

कि भूख से मरा था चूहा,

इसलिये मैं बरी किया जाता हूँ

बाइज़्ज़त बरी

हुर्रे........................।

फू..................

आप सोचते होंगे कि क्या हुआ

फिर रेटकिल का???

आप बहुत ज़्यादा सोचते हैं,

हाँ, मैं नशे में हूँ

श्श........श्श..........श्श.....श्श...

(बहुत धीरे से, एकदम फुसफुसा के..)

बहन को खिला दिये थे

वे टुकड़े चालाकी से

क्यूँकि शादी करी थी उसने

-किसी मुसल्मान से

-खुद के गोत्र में

-किसी कमतर जात में

हा...हा...हा...हा...हा...हा....

’फिलहाल आत्मा सो रही है....

और मॉरटिन रेटकिल भी खुश है

क्योकि इस बार चूहा नहीं

बल्कि बहन मरी थी ठीक बाहर जा के.....।

Saturday, May 1, 2010

पर

बारिश से भीगी
उस शाम को
देखा था
बुर्क़े के भीतर
कॉरसेट पहने उस
बुर्क़ानशीं को
और
जाने किस आलम में
आगे बढ़कर
छोटी-सी
बिन्दी लगा दी थी
उस शफ़्फ़ाफ़ चेहरे पर
वो स्तब्ध
देखती ही रही
और चली गई
फिर मिलने का वादा करके
(अगले दिन)
-वो ही शाम  थी
-वो ही बारिश
-वो ही बुर्क़ानशीं
पर.......??? 

Tuesday, April 13, 2010

लाश

जबकि

दोपहर बेहद दिलचस्प है..........।

और हम

हस्बे मामूल*

डर रहे हैं

लाश से

खासतौर पर जब हमने खुद

अपने हाथों से मारा हो..........

हमें लगता है

कि वह मुरदा

कहीं आँखें न खोल ले

लिहाज़ा कई घण्टों तक हाथ में

चाकू लिये या कुछ भी

उसका इंतज़ार करते हैं,

कि कब वह आँखें खोले

और हम उसे

दोबारा गोद दें................

ये लाश

किसी की भी हो सकती है

पर होती है

अक्सर

-किसी किसान की

-किसी जवान की

-किसी भूतपूर्व नक्सल की

-बाँध में डूबे किसी गाँव की

और मेरे इलावा

कोई भी हो सकता है

हत्यारा.........................

जैसे कि आप

अरे! डरिए मत........

हा.....हा......हा......हा........

जबकि दोपहर बेहद दिलचस्प है ।

तब भी

वक्त खिसक लेता है दम साधे

और हम(यानी कि मैं क्यूँकि हम से डर भाग जाता है)

बैठे ही रहते हैं उसके पास

उन बंद आँखों में आँखें डालकर

अगरचे

मेरा उल्टा पाँव सो चुका है

और मारे दहशत के

मैं काँप रहा हूँ

कि लाश की जद में सिर्फ़ मैं ही हूँ

पर फिर भी

मैं बात कर सकता हूँ,

-बिना आँखें हटाए लाश से

अपनी दोस्त से

बेसाख़्ता....................................

-बिना आँखें हटाए लाश से

कर लेता हूँ कामुक-चिंतन.........

-बिना आँखें हटाए लाश से

हाथ मिला लेता हूँ

कत्ल करने को

जाते मोस्साद के एजेंट से.......

और

-बिना आँखें हटाए लाश से

गुज़र जाता हूँ

मिर्ज़ा-मलिक के

पीछे भागते

जोकरों के समूह से.............

आह........पर,

अब मैं थक चुका हूँ

डर रहा हूँ

खुद के एकालाप से

देखिये मेरा

दूसरा पाँव भी

सो चुका है

और मैं लाचार जानवर-सा पड़ा हूँ

किसी सूनसान बियाबान में;

रह-रह के झुरझुरी-सी

देह में फैल रही है

अब...मुझे इंतज़ार है,

पुलिस का

और देखिए तो

सायरन बजाते हुए गुज़र जाती हैं

पुलिस की ढेर-गाड़ियाँ......................,

इस सन्नाटे में

उस........उस

लाश में हरकत हुई है, हाँ....हुई है.....

मेरा चाकू छिटक चुका है

कब का ....

और गूँजती है तीखी चीख...................

वाक़ई में वाक़या

दिलचस्प था .................।

*हस्बे मामूल-हमेशा की तरह

प्रणव सक्सेना amitraghat.blogspot.com”

Friday, March 26, 2010

कुंता

अब
जबकि छोड़ आया हूँ  मैं
कुंता को बरघाट*
और भूल चुका हूँ
उसका सादा-सा चेहरा
दो ही दिनों में,
तब भी,
क्यूँ कर रहा हूँ
उस दिन का विश्लेषण
अपने मित्र के साथ उस
सूने से पार्क में
अपरिचित मुर्गाबियाँ देखते हुए
शाम को
क्या इसलिये कि
पूछ रहा है वह
उस रात की शुरूआत
जब उतरा था
स्त्रियों की तरह
आँखें बन्द कर मैं
समाधि में,
और कुछ ही देर बाद
किसी शरणार्थी-सा
दुबक गया था
उसके भीतर
और
खरोंचता ही रहा था
जाने कितनी देर
छाती पर गुदे
गोदने को.............,
             हाँ,केवल दो रोज़ में ही
              उतर गई थी
              बोतल में.......  मैंने कहा
पर भूल गया जान के भी
उसको बताना कि
-बेझिझक थी कुंता
-बखान से परे...........,
उस ढुलक चाल से उतरती
उघरारी रात में
दरख़्तों को छूती  बहती बयार में
जब ज़िंदगी
छटपटायी थी
तब अधकच्च मँजरियों की गंध लिये
छूने दिया था उसने मुझे
स्वयं को..............,
और ढह गया था मैं
उस आदिम उच्छावास में
जबकि होता उल्टा है
              बदचलन होगी...मित्र बोला
              नहीं...................,
पर रात सरक रही थी
चुपके से
आढ़त में माँगे
अहसास लिये,
और कुंता भी…....,चली गई,
पर उस रात
खोला था उसने भेद
कि मुझसे भी पहले
किये थे कई
आलिंगन,
पर छूने दिया था उसने
सिर्फ़ मुझे ही
खुद को......................!
अब 
जबकि भूल चुका हूँ
उसका सादा-सा चेहरा
तीन ही दिनों में
तब भी क्यूँ..............................|
*बरघाट-एक जगह का नाम
प्रणव सक्सेना
amitraghat.blogspot.com            

Sunday, March 21, 2010

हेल्मेट

वह रक्षाबन्धन के दिन
कुछ किलो मीटर की दूरी पर रह रही
बहन को लिवाकर
बाईक से लौट रहा था
उधर तेजी से आते ट्रक ने उसे
टक्कर मार दी
भाई वहीं धाराशायी हो गया
बाजू मे उसके लटका स्वस्थ हेल्मेट रह गया,
तभी घिर आए तमाशबीनो मे से कुछ का मन  
भाई को अस्पताल पहुँचाने की गुहार
लगाती बहन के अस्तव्यस्त काया से
दीखते अंगो पर अटक रहा था
तो कुछ व्यवस्था से डरे थे ,  
किसी ने उसे अस्पताल नहीं पहुँचाया
वह तड़प - तड़प कर वहीं  मर गया
कि तभी
सर्व व्यापी गिद्धों ने
सबको खदेड़ दिया
अब लोथ पर व्यवस्था का क्रूर शिकंजा था
और अविलम्ब
व्यवस्था ने पचास रुपए का चालान
काटकर विक्षिप्त बहन को तत्काल सौंप दिया
उनका मानना था
उस युवक ने हेल्मेट नहीं पहना था ।
प्रणव सक्सेना
Amitraghat.blogspot.com