हद्द हो गई !
अब जा के मिला है जेब में,
वो बित्ते-भर का चूहा
जिसे कत्ल कर दिया था बवजह
कई बरस पहले,
मॉरटिन रेटकिल रख के
”नहीं, ये विज्ञापन कतई नहीं है
बल्कि ज़रिया था मुक्ति का..........“
पर फिर भी
चूहा तो मिला है !
और मारे बू के
छूट रही हैं उबकाईयां
जबकि उसी जेब में
-हाथ डालें-डालें गुज़ारा था मैंने जाड़ा
-खाना भी खाया था उन्हीं हाथों से
-हाथ भी तो मिलाया था कितनो से
तब भी,
न तो मुझे प्लेग हुआ
न ही किसी ने कुछ कहा..........“
पर तअज्जुब है कि,
कैसे पता चल गया पुलिस को,
क्या इसलिये कि
दिन में एक दफे जागती है आत्मा,
और तभी से मैं
फ़रार हूँ................,
और भी हैं कई लोग
जो मेरी फ़िराक़ में हैं
जिन्हे चाहिये है वही चूहा,
ये वही थे
जो माँगा करते थे मेरा पेंट अक्सर
इसीलिये मैं नहाता भी था
पेंट पहनकर,
(“था न यह अप्रतिम आईडिया..”)
पर,
अंततः मैं पकड़ा जाता हूँ.....
ज़ब्ती-शिनाख्ती के
फौरन बाद
दर्ज होता है मुकद्दमा
उस बित्ते से चूहे की हत्या का,
और हुज़ूर बजाते हैं इधर हथौड़ा
तोड़ देते हैं वे
अप्रासंगिक निब को तत्काल
और मरने के स्फीत डर से बिलबिला जाता हूँ मैं
कि तभी ऐन वक्त पर
पेश होती है
चूहे की पीएम रपट
कि भूख से मरा था चूहा,
इसलिये मैं बरी किया जाता हूँ
“बाइज़्ज़त बरी”
हुर्रे........................।”
“फू..................”
आप सोचते होंगे कि क्या हुआ
फिर रेटकिल का???
आप बहुत ज़्यादा सोचते हैं,
”हाँ, मैं नशे में हूँ
श्श........श्श..........श्श.....श्श...”
(बहुत धीरे से, एकदम फुसफुसा के..)
बहन को खिला दिये थे
वे टुकड़े चालाकी से
क्यूँकि शादी करी थी उसने
-किसी मुसल्मान से
-खुद के गोत्र में
-किसी कमतर जात में
हा...हा...हा...हा...हा...हा....”
’फिलहाल आत्मा सो रही है....”
और मॉरटिन रेटकिल भी खुश है
क्योकि इस बार चूहा नहीं
बल्कि बहन मरी थी ठीक बाहर जा के.....।”








17 टिप्पणियाँ:
"ये कविता है या कि वार्तालाप , पर है बेहद खतरनाक , सामयिक कविता लिखी गई है चूहे के माध्यम से ..."
बहुत सुंदर कविता है ये.
रोचक ।
mujhe bahut badhiya kavita lagi aapki.....dimag tight ho gaya.....ek sachayi lagi.......
rochak....... adbhut........... maja aa gaya........
वाह बहुत ही सुन्दर, रोचक और मज़ेदार रचना लिखा है आपने! बढ़िया लगा!
मेरे बड़े भाई साहब भी कलाकार हैं. जब उनकी बनाई पेंटिंग मैं समझ नहीं पाता तो कहते हैं ..मार्डन आर्ट है..! समझो, तुम नहीं समझोगे तो कौन समझेगा..!
यह कविता पेंटिंग में होती तो कहते...ये चूहा दरअसल चूहा नही है ..! हाँ, बहन को मारने वाली बात समझ गए..चूहा भी समझो..चूहे की भूख को समझो..यही तो बात है.
प्रणव जी, आपकी कविता को कई लोग मेरे ब्लॉग पर देख कर मेरी समझ बैठते हैं :) और मुझे मुफ्त में ही प्रशंसा मिल जाती है... अति संवेदनशील व मार्मिक कविता है...चूहे के प्रसंग के साथ गोत्र से परे जा कर विवाह करने पर बहन की हत्या का दर्दनाक चित्रण है... धन्यवाद एक बार पुनः मेरे ब्लॉग पर अपनी कविता प्रेषित करने हेतु....
कविता न सुंदर है, न रोचक। मार्मिक है ज़रूर, उसी तरह जैसे बहन-बेटी न चूहा है न पतंग, सिर्फ़ बहन-बेटी है।
वाकई ख़तरनाक, झूठे दंभ और साज़िश के माहौल में आत्मीयता के नए मायने तलाशती।
जारी रहिए।
संवेदना ... आक्रोश ... समाज की व्यवस्था पर व्यंग ..... बहुत ही गहरी रचना है ....
सामयिक,रोचक और मज़ेदार रचना लिखा है आपने.
bahut higahari soch rakhate hai aap vah bhi marmikata liye hue.
poonam
sansaneekhej aur rongate khadee kardene walee.....rachana par ise soch kee utpattee hamara khokhala samajaur jativad hee hai.........jhakjhor gayee aapkee ye rachana........
...बहुत खतरनाक लग रही है भाई !!!
और भी हैं कई लोग
जो मेरी फ़िराक़ में हैं
acchi kavita hai..
जितनी समझ आयी अच्छी लगी. जितनी रह गयी वह भी अनूठी तो है ही. बधाई!
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