Saturday, February 13, 2010
Friday, February 12, 2010
शलाम शाब
धुँधलके को तोडती हुई
वह आवाज़
”शलाम शाब”
”दीवाली का इनाम शाब”
और सस्मित आ खड़ा हुआ फिर सलाम ठोकता
मालदार महाशयों के बीच जी रहा
हज़ारों किमी दूर थानकों से अभिनिष्क्रमित
तथागत की जन्म स्थली का वह वामन युवा
चुपचाप देखता कई दिनों का रखा
उपयोगितावादी पड़ोस का आडम्बर और मुँह चिढ़ाते
5-5- रूपये के दो सिक्के
रात की सी खामोशी आँखों में भरे
सलाम ठोकता चौतरफ गूँजते मौन को पीछे छोड़
ओझल हो जाता है कि सहसा फिर दीखता है
सींखचों के पार चोरी के आरोप में
लिये वही स्मित वही शलाम और थका संवाद
”हज़ार रूपये के वास्ते”
समर्थन
”सिर्फ हज़ार” (आश्चर्य)
मौन
”सिर्फ हज़ार(घृणा)
विस्मय
”छिह........छी.........,।“
विद्रूप हँसी हँसता गुम हो जाता है बेइलाज
दम तोड़ चुकी माँ की याद लिये कि तभी
फिर प्रकट हुआ अलग वेश में
हास्य मंचों पर
सामूहिक ठहाकों से पिटता
मातृभू के उपहास से आहत
सिर झुकाए मुस्काता
जीवन की तलाश में पराये देश आया वह
लौट जाता है चुपचाप
बागमती* की पनाह में.... ।
बागमती- नेपाल देश की नदी
प्रणव सक्सैना amitraghat.blogspot.com
Thursday, February 11, 2010
शुरूआत
जीवन से ऊबकर व्यवस्था से निराश
चट्टान के कगर पर खड़ा
सामने वितत-विशाल-औंडा-ताल
पूछा स्वयं से,”सोच ले फिर से,
क्या मरना ज़रूरी है?”
”हाँ,” -दू टूक-सा दिया मैंने उत्तर
और कूद पड़ा झट से;
तीखी थी छलाँग, ताल ने भी नहीं मचाया शोर
ना ही कहीं उठी हिलोर
व्यवस्था को पता ही नहीं चला
कब मैं मर गया ।
निष्ठ्यूत पीक की तरह
ताल ने भी तत्काल मुझे उगल दिया
और पानी की थिर ज़मीन पर मैं आ लगा
मेरी लोथ पर किसी का भी नहीं ध्यान था
कुछ बोटिंग मे मग्न थे
कुछ लड़कियों की बातों में रमे
तो कुछ मच्छियों की ताक मे दूरतर
फैला रहे थे जाल
मैं स्तब्ध था
सनातन परम्परा की अवहेलना से अवाक
उस घिर आई रात में ताल से भी निकाला गया
तट के कीचड़ मे औंधा कई रोज़ पड़ा रहा
लावारिसों की तरह
न कोई मक्खी आई
न कोई गिद्ध
न चींटियाँ
न पुलिस न संबधी न समाज
न ही व्यवस्था चरमराई
मैं फूट-फूटकर बिखर गया
जीवन भर जानबूझकर अपदस्थ किया गया
मृत्यु पश्चात ऐसा तिरस्कार
मैं मर कर भी निराश रहा
कि तभी दृष्टि-परिधि के अंत में
कुछ छवियाँ तिर आई
वह वृक्ष तल का क्षौरिक, वह पौरिया,वह घुरबिनिया, वह बेडनी,
वह बूढा खींचता था जो असबाबी ठेला खड़ी चढ़ाई पर
अंत में सबों को चीरकर रोम का वह गुलाम
स्पार्टकस* एक थ्रेसियन,
जिसने जीवन को भोगा, व्यवस्था को समझा
जिसके लिये जीवन-विरूद्ध न कोई प्रश्न था न कोई तर्क
वरन कुछ था तो मात्र आशाओं के फ़लक-बोस-हर्म्य
हुलासित हृद्य हुलालित अंतःकरण
और जीवन के प्रति अगाध प्रेम,
वे सब आए बिना बोले सस्मित,मैने देखा,महसूस किया
हर ओर हर जगह हर देश में
स्पार्टकस फैले पड़े हैं जो मरकर भी जीते हैं
संघर्ष करते हैं सिर्फ जीते हैं
अब मैं चुप था, उदास; किंतु दशमलव मात्र भी नहीं निराश,
रात कट चुकी थी भोर उमग रही थी
सहसा एक अज्ञात चेतना से देह हिल उठी
कहीं हवा लहराई, जीवन की तलाश में हवा के विपरीत
आकर्षित गंधानुसरण करतीं कुछ डायोप्टैरंस*
मेरे कानों में भिनभिना उठीं,
आंतरिक अपघटन आरंभ हो चुका था,
मैं बजबजा रहा था , संभवतया यही मेरा प्रायश्चित था
यही शुरूआत..........।
स्पार्टकस – हावर्ड फ़ोस्ट की कालजयी कृति आदि विद्रोही का नायक
डायोप्टैरंस - शव पर सबसे पहले-पहल आने वाली मक्खियां
प्रणव सक्सेना amitraghat.blogspot.com
Wednesday, February 10, 2010
Saturday, February 6, 2010
मनोभिलाष
सवेरे का वक्त था,
आसमान कुछ आर्द्र, हल्का नीला
हरित पत्तियों पर ठिठकी
नन्हीं-नन्हीं जल की कुछ बूँदें,
प्रकृति की सुघड़-स्वच्छ घटा में
बारिश की आड़ी-तिरछी-फुहार
मदोन्माद से बहता खुला-खुला-सा निरंकुश नाला
सुदूर पूरबी क्षितिज से झाँकते
धुँधले नीले पहाड़,
तब भी सड़कों पर पसरा अंधेरा,
जैसे झुट्पुटे के वक्त,
मलिष्ठ सड़कें
जलाचित बिखरे गड्ढे
मकानों से निकलता यहाँ-वहाँ पड़ा
कूड़े-करकट का ढेर
और बिखरता धूम;
सामने दीवार फाड़ते
पीपल की निर्वसना शाख पर
पराबध्द कुछ कौवे
नीचे ओहत कुकुर की सड़ती लोथ
वहीं पीछे छूटती
अभावमंडित
एक नीची छत की इमारत
बहुत छोटी और कुरूप
कुछ वर्गफुटों की
नितांत अकथनीय ।
अकस्मात !!!
खुला उसका कवाट
निकली एक पीवरी सद्यस्नात
धरे सिर पर पल्ला
ग्रह की सरल परिधि को लाँघ
आभा-परिहित-दमक रहा आनन उसका
भरिभाल पर झूलते मूँज से बाल,
सवत्स; जा रही हो जैसे मन्दिर
भग्न-प्रतिमा-सी तल्लीन
था जिसमे सहज समर्पण
अहं-मुक्त-भावों में लीन ।
पहन पीत वर्ण की साड़ी कस के पकड़े
यथा खींच लगाम, करें नियंत्रित
कर्दम-निमग्न-निगुंफित-हरित-बिछावन
पर धर अलक लगाए नंगे पाँव,
पड़े जिसमे कलरव करते नुपूर-युग्म,
निराशा में ज्यों विवर्धित हो प्रकाश
तेज होता उत्तरोत्तर बिन्दुकलनिनाद ।
भर उफाल
कर गई पार
वह कुछ मोड़ों के कटान,
अभिमुख उसके एक बस स्टॉप,
वही था उसका मन्दिर, शुभ स्थान;
यातायात के उस अवज्ञात चिह्न पर लगा
तिलक अक्षत हुई वह नतमस्तक, कर प्रणाम
बैठ दंडवत, हो भावों में अभिरत करा विचार विगत का,
-“कल मिले थे यहीं कुछ ग्राहक, आज भी
करना वही क्रपा हे ईश तुम मुझ पर”-
भर आये उपात अवरूद्ध हुआ कंठ चूम ललन का ललाट बोली,”
अयाचित से कुछ अधिक ही पाया, तेरे प्रसाद को भी समझा निर्माल्य,
विलोक जब पुत्र के लिलार पर पड़ती मेरे कर्मों की प्रतिच्छाया
फूले थे हाथ-पाँव लगा भविष्य अंधियारा,तब विसर्जन का भी
एक बार उपजा विचार पर देख उस नवजात की
सहज-सलोनी-चितवन भूल बैठी मैं
समस्त जग के भावी चिंतन
हुए अंतर्हित वे गत विचार, फैल उठे आशाओं
के हर्म्यस्थलों के अंतहीन विस्तार;
यहाँ पुत्र ही मेरा संबल, जीवनाधार,है अब ध्येय
एकमात्र हो इसका श्रेष्ठ-उत्तम-विकास
समाज के मुक्त हस्तक्षेप के चलते जो नहीं पा सकी
मैं हतभागी, उससे भी लक्षाधिक देना हे ईश
पुत्र को मेरे, यही बस याचित मनोभिलाष ।
प्रणव सक्सैना amitraghat.blogspot.com
Wednesday, February 3, 2010
हम्माल
हम्माल
उस
सियाले में
अकस्मात
जंगल की हवा में समाहित
वनद्रुमों की मदनीय सुवास से
नहाई शाम में
घर लौटे
धुलिया-मिटिया,धुरिया-धुरंग
लगढग नग्न
लीतड़ा पहने
युगों से विशाल भार को काँधें लिये
आदिम रहस से भरे अंतस की
पहरेदारी करता
वह हरहठ
युवा हम्माल
जिसकी सुदृढ़ माँसपेशियों से ढिरते
श्रमबिन्दुओं से तरबतर देह पर आप्यायित
कीटाणुओं से उपजी दुरबास और मुख से आती
गहन सिसियाँद से बेपरवा
सिहरती-सी हसरतों से उसे देखकर
उस के जाँगर पर आसक्त
वह मदिर वरवर्णिनी जिसकी
उत्तप्त श्वाँसों से आप्लुत वह
पसीनाई चेहरा
जिस पर झुकती है वह
साँझ की तरह
दूर-तर छितरी जुन्हाई से झल-झल मदभरी रात में
और डूब जाता है वह युग्म
प्रेम के गहन पुरातन पाश में।
प्रणव सक्सेना
amitraghat.blogspot.com
Friday, January 22, 2010
माँ के बारे मे
माँ के बारे मे
जाने कैसे??? उन्हें
पता चल गया कि मैं एक कवि भी हूँ
आदमी होने के अलावा
और फिर तब,
-नक्सलियों ने
-फिदायीनों ने
-आत्मघातियों ने
सबने
समवेत होकर
मोबाइल पर मैसेज किया
कि मुझे कविता सुनानी है
उनके बीच
-प्रेमभरी
-वासनामयी
जिसमे ज़िक्र हो लड़कियों का बेसाख़्ता..
और हो सके तो कुछ
“लड़कियाँ भी ले आना,
जो स्टेशन किनारों पर
इशारों से बुलाती हैं............अक्सर.....।“
पर.......
मैं पहुँचा खाली हाथ,
तलाशी में मिला उनको
-कविताओं का सिर्फ बन्डल
और खाने का छोटा-सा डब्बा,
वे ले गए मुझे
एक ओर
कैंप से दूर
चुपचाप.....
उनकी मूछें थीं हल्की-सी
वो दुबले थे पतले थे और कड़ियल भी
उनकी जेबें RDX से भरी थी
उन्होने सुनना चाहा वो, जो मैं लाया था
और फिर कई घंटों तक वे सुनते ही रहे
मेरी कविता......
जिसमे एक लड़की थी,बेहोश मगर सुन्दर
उसका गुदाज़ जिस्म
उसकी लरज़िश
बेहिसाब उसके चुम्बन,
ले गया मैं उनको प्रेम की सुरम्य वादियों में,
वासना के बीहड़ मे,
मगर वे चुप ही रहे.....शांत,
न कोई क़हक़हे
न कोई तालियाँ
न कोई मदहोशी
न ही अभिनन्दन,
था तो सिर्फ विस्मयी सन्नाटा
और प्रश्न पूछ्ती वे सर्द आँखें
”माँ के बारे मे कभी लिखते हैं बड़े भाई ?”
.........................और......................।
भर आई मेरी आँखें देख उन्हें
हाथों मे कसके दबाए मेरी माँ की रोटियाँ
-देख रहे हों जिसमे शायद अपनी माँ का अक्स
-सूँघ रहें हों जैसे अपनी माँ की महक
और.......और.......और.............
फिर मैं चल दिया.
और चलते-चलते दौड़ता ही रहा उस रात
एक कगार से दूसरे तक.........।
प्रणव सक्सेना amitraghat.blogspot.com
Saturday, January 9, 2010
मुर्गा
हर एक जन्मदिन पर मेरे
मुर्गा कटता है।
उसकी गर्दन पर
आहिस्ता-आहिस्ता फिरती छुरी
को महसूस किया जाता है अक्सर
खाना खाने के फौरन बाद
और मर्सिया गाता है पूरा परिवार;
फिर उसकी चबी हड्डियों को बचे चावल को और
गंधाती प्याज को फेंक देते हैं
पालतू कुत्ते के सामने लप-लप खाने के लिये;
रात भर जी भर के आती हैं
डकारे और सपने में दिखता है मुर्गे का तड़पना...
और .....सुबह होते ही
जुट जाते हैं हम सब
बचा हुआ मुर्गा खाने के लिये
क्योंकि सीज जाता है वह तब तक..।
प्रणव सक्सेना “amitraghat.blogspot.com”
Thursday, January 7, 2010
तरुणाई के पार
तरूणाई के अंतिम पहर
जब मैने उसे
ठठाते-उछलते-कूदते-धप-धड़ाम
गिरते उठते देखा था
मगर
सरलता के अवसान
की उस घड़ी
के साथ ही
वह लड़का अब बड़ा-सा दिखता है
शबल पृष्ठों से भरी मेगज़िन को वह
बेहिचक पीछे से पलट
सस्मित देखता है !
Sunday, October 4, 2009
महंत (लुप्त होते देहाती शब्दों की नाट्य कविता)
मदभरी फगुनहट में
ढाक तले आ जुटे अहा! देखो,
कुल-छोटे-बड़े-पदहैसियतानुसार- क्रमबद्ध
खुरदुरे-ठठाते-चुप्पे-चकमे-बदमस्त
बोली कसते भोले-भाले,
हज्जार-पानसो-सौ-पच्चास-बीस-दस-पाँच-दो
और एक के नोट और संग कछु कलदार
फिर आगे बढ़-बढ़ हुई जोहार
कि खिंच गया तभई सन्नाटा
आये थे सभी बनने महंत
झटपट हुआ आरम्भ तब बिरता परदरसन;
सर्वप्रथम मौन तोड़ता अरे...रे..रे..रे...रे..देखो,
उठा वह पलीद पचासा,”बार गरल पर मैं लुटा था,
चोलिया में भी एक बार ठुँसा था,मुझे बनाओ महंत
मिलेगा सबो को परमानन्द.....।“
(भीड़) “अये...हय...हा..हा...हा...अ...हा...हा..वा..ह..ह....”
कि झट खड़े हुए उखड़े केसरिये कलदार
”महंत बनबे का हमार नैतिक अधिकार
भगाओ इसे हियन से फैला रहा बेभिचार....।“
“,अरे.....रे....रे....रे...ऊ....आक...थू...”बलगम थूकता
उठा पिलास्टर बांधे भदरंगा पाँच ,
“बनाओ मुझे महंत मेरी है चलती की बेरी
कर दो मेरी बस अंतिम इच्छा पूरी ....।“
”च्च... च्च...च्च...च...बैठ जाओ चच्चा.....”
बोला बीड़ी फूँकता अधेला
“हाँ....हाँ.....” सीड़ निकालती बोली
लुप्तप्राय–भूली बिसरी चौअन्नी
के तभी उठा लड़खड़ाता–सकसकाता
संझवाती जलाती गंवई स्त्री के हाथोँ मे दबा
सप्ताह भर की सब्जी के लिये बना
वह भकुआ दस का नोट
जाने क्या बोला क्या बुदबुदाया
कि तभी कूद पड़ा वह जूँमुहाँ युवा बीस
जबरन निपोरते खीस , हुलसकर बोला,
“बच्चों का हूँ मैं यार आती मुझसे
डेरी मिलक दो पीलीज़ मुझे मुखिया बना दो.....।“ (भीड़)”हो...हो...हो...हो...टूँ...टूँ...खी...खी...खी....”
सूखे पात फेंक उसे भगाया,
अब की उठा इंगरेजी बूकता हज्जार
सबों को निबेरता महंत का मजबूत दावेदार
अ...ह...ह...ह...चेहरे पर नेतई मुस्कान
क्या ठसक वाह-वाह क्या टिमाक
सगलगी करते संग उसके पानसो और बुर्जवा सौ
नजरों से छानकर थानक पूछा,
”अरे कहाँ गये वे नोट एक और दो....?”
यकायक गह्वर-सी चुप्पी तोड़्ते
उठ खड़े हुए वे बामन नोट
राह खड़ी भीड़ चीरकर चल पड़े हौले-हौले
मंच की ओर, रूँधी आवाज से बोले,
”हमसे (ओहो..) होती (अच्छा...) बोटों की
बारिस (खी...खी...खी...) बनती हमऊ से (महजी नमस्ते॥) सरकार क..क्योंकि
हम॥म।से मिलता रासन का एक किलो
घुना-गेंहू-लाल, भरते इसी से एक समय का पेट
बनाइये हमें ..महंत..हम..म..म.....................”
छा गई निस्तब्धता, थम गई पुरवाई
था केवल पत्तों का मर्मर
कि तभी ताव खाए पानसौ को रोककर
पूछ बैठा हज्जार चौंककर,
”ऐं...??...??...एक किलो घुना गेंहू वह भी लाल...
वाह-वाह सरकारी ढोरों का क्या खूब है कमाल...।“
फिर भर आई आंखें पोंछ्के
ले हाथों मे चुटकी भर गुलाल और टेसू की शाल,
”धन्य हो दद्दा सच्च में तुमहई हो महंत के काबिल
एक बेर का ही सही देते तो हो नया जीवन........।“
(भीड़) “हाँ....हाँ.....हाँ सच है ऐं ही है मुखिया के काबिल हो...हो हो..”।
और बज उठे दमामे–घन्ट–घड़ियाल होने लगी
जै जकार; बहने लगी फिर से मद भरी बयार
सर्र....र्र....र्र....र्र....सर्र....र्र....र्र....र्र....साएँ....साएँ....।
प्रण्व सक्सेना “अमित्रघात”
Amitraghat.blogspot.com
Tuesday, August 25, 2009
सेल्समेन
घास के विराट मैदानों की तरह
फैली सर्द रात के सन्नाटे
को चीरती है
- जैसे लकडहारे चीरतें हैं लकड़ी
-उसकी माँ की चीख
और हम सब बड़ जातें हैं
पोस्ट - मार्टम कक्ष मैं
मेरे सामने ही होता है शव विच्छेदन
और निकलती है उसमें से
-ढेरों मन गालियाँ
-दुस्तर लक्ष्य
-अंतहीन दबाव
-असंखय गुटकों के पाउच
-"कुत्तों से सावधान ""सेल्समेन आर नोट एलाऊड की पट्टियाँ"
तिरस्कार से बंद होते दरवाजों की आवाज
और ..........................और...............................और
एक कोने मैं दबे कुचले सहमे माँ के कुछ सपने ;
"आखिरी बार कब हंसा था ?
"मरने से कुछ देर ही पहले "
गीली रात ढलती है
भौर उमग रही है
रोशनियाँ पीली पड़ने लगती हैं
लम्बोदर
गिरती महीन जलराशि - मध्य
उस लम्बमान ताल उपात से सटे
संकुल वृक्षों की लसस डालियों
के पत्र्पुन्ज से आवृत स्थल पर
कार स्कूटर ट्रक ट्रालियों मैं
विराजित - विसर्जन के लिए
बाट जोहते लम्बोदर असंख्य - जनों के संग
अकस्मात
चीरकर
वह पगलाई स्त्री
ताल की अथाह गहराई मे चलते चलते
डूब गई उसके कांधे पर उसका
लम्बोदर था जो
भूख से तड़पकर
उसी दिन अंकोर मे सर रख कर
मरा था
राजा बुश
हतप्रभ है वह
पश्चाताप -हीन व्यवस्थित अपराधी
रजा बुश कि
कैसे चल सकता है मुकदमा उन पर
क्या राज प्रसाद से पाई गई
एक मुर्गी के पर चबी हड्डियाँ और खून के छींटें से
मुकदमा बनता है ?
फ़िर भी राजा बुश पर चला-
--मुर्गी को क्या आपने काटा था राजा बुश
नहीं मरोड़ा था बेरहमी से-
--क्या आपने पर नोचने के लिए गरम पानी किया था ?
नहीं मैंने चुनचुन कर एक एक पर खींचा था
जब वह जिंदा थी-
--क्या किया फ़िर
शोरबा निकाला उसका -
--फ़िर पिया
फ़िर..............फ़िर..................
।उसकी हड्डियों को चबाया
--फ़िर क्या आपने पुट्ठों पर हाथ झाड़ कर चल दिए
नहीं कतई नहीं मैंने पुट्ठों पर हाथ नहीं झाडे
मैं एक कोने मैं बैठ गया
मेरे जेहन मैं मुर्गी थी
मैं खूब देर तक रोया ; उसकी मौत पर
फ़िर मैंने एक कविता लिखी
आसुओं मैं डूबी ,
--आपने कविता लिखी राजा बुश
हाँ (स्वर भर्राया था )
आप बरी किए गए राजा बुश
Wednesday, April 8, 2009
सभ्य वैश्याएं
छोटे-छोटे नीची छतों के घर
जहाँ हर घर एक चकला घर
जिनकी अपनी ही एक गाथा
जिनका अतीत भी और वर्तमान और अनिश्चित सा भविष्य
जिनकी एक सी ही तस्वीर
जहाँ गन्दी-गन्दी टेढ़ी मेड़ी अनंत गलियां
साय में जिनकी कुकुरमुत्तों सी उगी व तनी दारू की भट्टियाँ
आसपास गंधाते कनस्तर - पीपे - घड़े
सड़क के किनारे पर खुली नालियाँ बदबू- खटास भरी नीचे ,
तैरती भारी हवा में घुंघरू की आवाज और तबले की भर्राई थाप
बाजारू गीतों के बोल
सध: जातों का रुदन
पैसों की छीना- झपटी ट्रेफिक की धीमी - चिढ़-चिढ़ी भनभनाहट
मांस के बाजार में इधर-उधर डोलती झाँई-माँई खेलती
बहुत चोटी पंख नुची लड़कियां
ग्राहकों को पटाने की होड़ और
लड़कियों की झल्लाहट जिंदगी की तलाश में मुक्ति की छटपटाहट
कला की आत्म हत्या कोठों से पलायन होटल-पब - डांस -बार -बस स्टाप भयावह सघन प्रतिस्पर्धा वैश्विक होता समाज भद्र-लोक से निकलती
ढेर सारी सभ्य वेश्यांए
Sunday, February 8, 2009
सुंदरतम सजनी
आया जब से तुम से मिल कर ,
ले - ले चुम्बन आलिंगन भर ,
नहीं भूलता मैं वह रजनी -
आच्छादित घन घोर घटा मैं,
पानी बरस रहा था रिमझिम ,
चकमक चमके विधुत-स्वर्णिम ,
अग-जग था अचित निद्रा मैं ;
आकर चुपके से पा अवसर ,
तुमने कितने धीरे - धीरे ,
हाथ बढ़ाकर मेरे नीरे,
था खींचा जब मेरा अम्बर ,
पाकर किंचित चेतनता को ,
करवट बदली ली अंगडाई ,
उसनींदी बाहें फैलाई ,
ज्यों ही मैंने ऊर्ध्व दिशा को ,
आई पुलकित जल्दी इतनी ,
लिए अतुल सुकुमार - शीलता ,
बाहु - पाश मैं, नहीं भूलता ,
स्मृति - प्रिय सुन्दरतम सजनी !
Wednesday, February 4, 2009
आत्मघाती का सच
जाने किस खंभार में
तार पर बैठी हल्ला करती लाल चिडिया
और आसमान पर टंगे - नीचे
गिरते रक्तिम बादल और
अरे हाँ !
था तो मैं भी वहीं
बूढ़े बोहड़ के नीचे उस
जन संकुल स्थल पर
जब हुआ था स्फोट
और उड़ गए थे
- सत्ताधीशों लोलुपों के
- कुछ नेताओं के
- मानसिक शोषकों के
- कुछ हरामियों के
- बिलावजह भूंकतें कुत्तों के
- बीच सड़क पर पागुर
करती जइया के
शरीर के चिथड़े
और फ़ैल कर काला पड़
गया लाल रक्त
पर वह जिंदा था जिसने
किया था यह कारनामा
चुपचाप देखता बैखौफ आंखों से से ख़ुद
की एक कटी टांग और एक कटा हाथ
कठहंसी हँसता किंतु उसकी
घोषणा करती आँखे कि
मुझ पर मुकदमा चलाओ
मेरा इलाज करवाओ
मुझे मेरी बिटिया को स्कूल से लेकर आना है
Wednesday, January 28, 2009
सूना जीवन
सुनाई देता है बस सन्नाटे का
अट्टाहास
दिखाई देता है तो बस
गहन अन्धकार
खिलखिला कर हँसी थी कभी किसी
सदी
मेरा भी घर था
कभी
जहाँ एकांत ढूंढे नहीं मिलता था
खुशियों का सैलाब बहा करता था
घर वही है
समाज लोग वही हैं
पर सामाजिक बंधन टूट गए लगतें हैं
रिश्ते स्वार्थ सिद्ध हो गए हैं
फ़िर भी इक आस ने अब तलक
जीवन ज्योत जलाए रखी है
कि कभी तो संवरेगा मेरा सूना जीवन
लौट कर आएगी खुशी मेरे
घर आँगन
Thursday, October 16, 2008
मेरी बहन
हुए फ़िर आरम्भ , प्रयास अथक निरविच्छिन्न निरंतर युवती ने भी दिया विमन सर्वथा परिजन - साथ और सदा की तरह सहा पुरूष प्रधान अपसंस्कृति का निर्मम प्रहारओह ! धरा में धंसे हे देव प्रवर दृग मूंदे मंद हँसी क्यों हँसते हो क्या छिपा है कोई गूढ़ोत्तर इस मौन में अथवा प्रसन्न हो वर पक्ष के आराधन से देखो वे जो आय देखने भदंत कई दुकान अवस्तिथ प्रदर्शित वस्तु समझ दिए कैसे उत्तर उस सरल ह्रदय युवती देख कर, कन्या दुबली है थोडी लम्बी है रंग नहीं है साफ़ , परिवार भी है नंगा बूचा वर की बहन को हुई अस्वीकार सीधी साधी आंग्ल संस्कार विहीन अंत में सर्व प्रिय घोष जन्मपत्री नहीं परस्पर मिली क्योंकि कन्या में है प्रबल मंगल दोष किन्तु थी अभी शेष यातना की पराकाष्ठा , सहना था उसे आघात , मर्म को था जो भेदता , आए एक जुड़ुंगी लिए किंभूत प्रस्ताव बोले वे " कन्या नहीं रही अब कन्या हो गई वह अब तीस की , कर चुकी विवाह वय पार अतः अब नहीं उस हेतु इस धरा पर कोई संयोग शेष , एक रिश्ता है सुपात्र का आंखों में हे पड़ा , जाने कब से बाट में जोह हूँ रहा घर उसका स्थापत्य - सा, शून्य है मांग ,केवल दस वर्षीय बालक उसका भोलाभाला करना शोभित अट्टालिका को वह मातृविहीन ;वह विधुर थोड़ा सा ही बड़ा है किन्तु तुमने कभी सुना है , पुरूष क्या होता कभी बूढ़ा है ?उस रात सहसा उचाट गई नींद भाई की , आया कक्ष मैं देख ध्वांत मैं एक छवि निमग्न अवसाद था जिधर मौन भी , सन्नाटा भी था जहाँ था फैला थर थर विधूत अवयव आवेश से , पल पल छा रही मस्तिष्क पर विगत अनुभवों की छाया विकलता से हाथ मारती वह इधर उधर , बैठ वहीं दीवार अड़तल अज्ञात भावों को लिए अंतस मैं , ताकती आकाश थी ;दुःख था अगोचर अस्तित्व भी हुआ विलीन सुन पदाचार स्वर स्थिर ही वह रही , क्या बोलता भाई उससे , ढांढस भी क्या बंधाता मौन ही रह उसके मौन को वह समझाता ; सहसा वह उठ खड़ी हुई झटक कर अश्रुओं को नियति को नहीं स्वीकार तीर -सी निकल कक्ष से बादामी कापियों के स्तूप को जांचने वह लगी ; भाई देखता उसे तो कभी ताकता आकाश टिमटिमा रहा था जहाँ तम् से लड़ता तारा एक मातृ किन्तु भावान्तर तो अज्ञात था नव विभात के साथ हुआ रश्मियों का सतत पर्यास आय फ़िर से उसे देखने एक नवांगतुक ; कठिनता से गई युवती कक्ष में होने तैयार ज्यों पीठ फेर कर भाई मुडा त्यों खुल गया वह कपाट साड़ी अब नहीं रही दुरूह उसके लिए किन्तु मातृ पितृ का भगीरथ श्रम हो चुका था फलीभूत ,फ़िर आगे जो घटा ,उसी लिंग के मौन में वह था छिपा
Friday, October 3, 2008
पैसेंजर
वन-वनांतर
डांडे पर लगे झुरमुट
आड़े - तिरछे खजूर के सरल दरख्त
समाधिस्थ - झुटुंग - बोहड़ के
विलुप्त प्राय - प्रसृत - बलस्थ वृक्ष,
मेघो के राज्य में सिरोन्नत किए
विस्मयी - विमुग्धकारी - गिरिशिखर
उटज ; छोटे - छोटे स्टेशन
वित्त - निरापद खेत - खलिहान मध्य ठाड़े,
कुछ अवगणित उजके चुप
संवलाई नदियों के मदमाते - उफनते यौवन पर
आसक्त - मदालस - बूढ़नद ; गुजरते मठ , सूने पुल
रेला - सी चली लजाती - ठठाती कुछ युवतियां कतारबद्ध
अलसाय बैरियर ; परिपाश्व मैं खड़े अधीर नर - मुंड - ठट्ट ,
डगमगाती सर्पिल परि - पथ पर भागती
एक निर्वाच्य - बूढ़ाती-जर्जर - पैसेंजर
आभ्यांतर जिसके जन्गुम्फित - प्रशस्त जनरल कक्ष
जिसके जीवन से भग्नाश खाली पेटों की सालती पीडाओं से विक्षुब्ध
अभावजन्य कुंठाए क्षितिज ताकती तर - पर
हावका
भरते अधेड़ ; आदिम ग्रंथि से ग्रस्त लटकती
उँगलियों में पड़ी ढेर अंगूठियाँ
हांक लगते हाकर्स के कामिक झुंड
कौतुहल से भरे परिचपल बच्चे शांत ॠद्धालु
रूग्ण - लड़ -खड़ाते डोकरे , हारे गाढ़े ठसी परछिद्रान्वेशी नारियां
गप्प मारते परिवापित - शम्श्रुल - तरुण
कुछ सोढर- निघर घट ढोंग धतूर तथा विडम्बक
जीवन प्रभंजन झेलते
हा हा ही ही हु हु खी खी ठी ठी करते
मिश्रित जन समूहों के अंत हीन जमघट ; उधर एक कोने सिमटी
वह नतनयन घट बैठी वर्षाहत हहराती सवत्स
दिव्या रूप के प्रति अचेतन , संघट्टावलेप से जिसका दमकता पुतानन
कान में बिरिया - टूम होंठ छूती बुलाक
कंठ में बिछे सिक्कों का मुक्ताहार बाँहों में बहुट्नी
कलाई में चूडियों का निबंध
ठालिनी - धारित लंक
नग्न पावों में जावक
व अनवट ,
बीच - बीच में उधडे वस्त्र
देह से झरता अनपेक्षित उपेक्षित जोबन
विलोक उस नारी का वह वन्य
वृक्ष लताओं सा आदिम अरण्य रूप ,
आरम्भिक झिझक छोड़ते निर्निमेष ; भूलते
भूत
भविष्यत्
चितन जमती होठों पर फेफ्ड़ी
भरते
फुफ्फसों
में आदिम सुवास ,
छाती उस बोगी के
समस्त पुरषों पर
अचिर उत्तेजना अकस्मात ;
तभी जीने के लिए जन्मा
भूख से कसमसाया वह
नन्हा सध: जात , देख सुन उसका क्रंदन
जहाँ नहीं कोई अड़तल
ताहम विस्मृत कर
समस्त व्रीडाएँ
खोला उस स्त्री ने देव दुर्लाभय अमृत से
भरा परिवर्तुल स्तन स्तब्ध नक्त पाषाण खंड से जड़
सम्मुख देखते सहज सुलभ्य नारीक दुस्पर्ष अन्चीन्हित
ज़िग्यासाएँ
अब भी एकटक किन्तु नहीं थे वे भाव अब
उन आंखों में यथावत
वरन बड़ रही ठी ह्रदय की प्रखर वेदना और
हो रहा था निर्मल जीवन का उदय शनेः शनेः ,
सत्यत: यह कैसा सनातन
मानस
क्या करता इस द्रश्य में अपनी मातृ दर्शन अथवा
तिरता स्मृति पटल पर स्वयं का
चिंता हीन अनदेखा अदभुत शैशव , की तभी
ढँक लिया इस प्रछन्न
मर्म को शिशु के चोंकने के
विभू स्वर ने , उधर नारियों ने भी की तत्काल ओट
अलार - सी , टूट चुकी थी
समस्त श्रंखलाएँ
जड़ता की , बाहर बढ रही थी
पूर्वपेक्ष्या गति उत्फुल्ल वर्षा की रिमझिम फुहार की








