Thursday, January 7, 2010

तरुणाई के पार

उस
तरूणाई के अंतिम पहर
जब मैने उसे
ठठाते-उछलते-कूदते-धप-धड़ाम
गिरते उठते देखा था
मगर
सरलता के अवसान
की उस घड़ी
के साथ ही
वह लड़का अब बड़ा-सा दिखता है
शबल पृष्ठों से भरी मेगज़िन को वह
बेहिचक पीछे से पलट
सस्मित देखता है !

1 टिप्पणियाँ:

RaniVishal said...

काफी अच्छी कविता है ....सराहनीय
मेरा भी कविता का ब्लॉग है
http://kavyamanjusha.blogspot.com/

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