Saturday, October 2, 2010

मेरा हमनशीं

मेरे होने का जिसने मतलब दिया था
मेरा हर ग़म अपना समझ पिया था
जिसने आँखों की घुलती हुई रोशनी को
लबों से चूमा था हथेली में लिया था
जो हरदम धड़कता था सीने में मेरे
जो चमचम चमकता था माथे पे मेरे
जो हँसता था तो कलियाँ खिलती थी दिल की
पल में मिलती राहें मुश्किल मंज़िल थी
जो औरो से था कुछ अलग मेरे दिल में
जो था मेरे संग-संग हर एक मुश्किल में
जिसने थामा था मुझको बाँहों में बाँहे डाले
जो आया था अंधेरे बनके उजाले
मेरा हमदम वो मेरा हमनशीं आ रहा है
मेरे मौला मेरा दिल घबरा रहा है
मेरे मौला मेरा दिल घबरा रहा है
-देवेन्द्र

10 टिप्पणियाँ:

अनामिका की सदायें ...... said...

chalo intzaar khatam hua :)

रोली पाठक said...

बहुत बढ़िया प्रस्तुति.....

Shaivalika Joshi said...

मेरे होने का जिसने मतलब दिया था
मेरा हर ग़म अपना समझ पिया था

bahut khoob kahaa...........

usha rai said...

मेरे होने का जिसने मतलब दिया था !!
ये बहुत बड़ी बात है !क्योंकि वही तो अपना है !लिखते रहिये ! हमारी शुभकामनायें आपके साथ हैं !

shiva said...

बहुत अच्छा :कभी समय मिले तो हम्रारे ब्लॉग //shiva12877.blogspot.com पर भी आयें /
नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ!

क्रिएटिव मंच-Creative Manch said...

मेरे होने का जिसने मतलब दिया था
मेरा हर ग़म अपना समझ पिया था

सुन्दर रचना
बढ़िया लिखा है
आभार

Vivek Jain said...

ज़िन्दगी तेरी मैं तफ़सीर करूँ भी कैसे?
पढ़ ही पायी हूँ कहाँ मै तेरे फरमान बहुत?
विवेक जैन vivj2000.blogspot.com

kshama said...

Aisa hamnasheen har kisee ko naseeb ho!

Domain registration india said...

Superb lines and i love this write up...

S.N SHUKLA said...

बहुत सुन्दर, सार्थक रचना , बधाई.



कृपया मेरे ब्लॉग पर भी पधारने का कष्ट करें .