कोलतार-सी
धधकती देह पर
ठुकी-झाँकती दो पनियल आँखें
सूखते होंठ-कर्रे बाल
लिये अधखुले धूल से सने पपोटे
ताकता है वह कभी आकाश तो
कभी घास के विराट मैदान-सा रीता ठेला
और लगाता है ज़ोर-की आवाज़
”पेप्परला-कोप्पीला-ताबला-पेचपुर्ज़ा-खाली बोत्तल-कबाड़ला..”
और हाँफ कर बैठ जाता है
ड्योड़ी पर, घूरकर
अपनी छोटी होती परछाई को,
इंतज़ार करता है वह
आसाढ़ की पहली फुहार का....”








25 टिप्पणियाँ:
marmik...
Are wah! kya tasveer kheench ke rakh dee!
bahut hi marmik rachna.....
सटीक शब्द चित्रण ...
बहुत सही!! बढ़िया रचना!
तारीफ के लिए हर शब्द छोटा है - बेमिशाल प्रस्तुति - आभार.
Mindblowing maja aagaya......
बढ़िया ....
kmaal ki hridya chhoonewali rachna.
सही!! बढ़िया
आपने बहुत शानदार लिखा
http://mydunali.blogspot.com/
फुहार का इंताज़ार तो हमें भी है
मार्मिक ! अच्छी प्रस्तुति
...behatareen !!!
आसाढ़ की पहली फुहार का....”
so is every one waiting.........
nice one............
नज़र के सामने से गुज़र गई पूरी फिल्म !
आईये, मन की शांति का उपाय धारण करें!
आचार्य जी
रचना का कथ्य और भाव जमे, शैली भी मगर कुछ है जो कम है। शायद मैं ठीक से जोड़ नहीं पाया अपने आप को। "छोटी होती परछाईं" से नहीं जुड़ा - दुपहर होने को है, यह समझ में आया - पर इसके तुरन्त बाद "आसाढ़ की फ़ुहार" से वह बिम्ब नहीं बना जो अपेक्षित था।
कुल मिलाकर रचना उत्तम है, पर और बेहतर की अपेक्षा है आपसे - "बहन और चूहामार" ने जो पैदा की है।
बहुत ही मार्मिक दृश्य उपस्थित किया आपके शब्दों ने....
मौसम को इंसानी जज़्बे से जोड़ कर बेमिसाल लिखा है ... सजीव चित्रण ...
प्रणव जी, आपकी कविता का शीर्षक पढ़ते ही घर के सामने से निकलता कबाड़ीवाला नज़रों के सामने घूम गया...कविता अच्छी है. जीवन का संघर्ष दर्शाती हुई..
भावपूर्ण रचना।
bahut badhiya...
भावपूर्ण रचना ।
आजकल कहीं व्यस्त हैं क्या आप? नई लिखाई कब आएगी भाई?
सच क बहुत बेहतरीन चित्रण----अच्छी कविता।
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